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...तो रेल हादसों में अब नहीं जाएगी जान

Mon, 05 Aug 2013 09:33 AM IST
लखनऊ/निशांत यादव
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दो ट्रेनों के बीच भीषण टक्कर हो या फिर उनमें आग लग जाए। ऐसे वीभत्स हादसों में बचाव व राहत पहुंचाने में हुई देरी से अब यात्रियों की अधिक जान नहीं जाएगी।
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रेलवे हर रेलवे स्टेशन पर मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का डाटाबेस तैयार करने जा रहा है। इतना ही नहीं डाटाबेस की जानकारियों के आधार पर स्टेशनों पर यात्री सुविधाएं बढ़ाने की योजनाएं भी तैयार होंगी।

इस डाटाबेस की मदद से भविष्य में होने वाली दुर्घटनाओं में बचाव व राहत कार्य पहुंचाने का नियंत्रण एक विशेष सेल के माध्यम से होगा।

जल्द ही सेल के गठन की प्रक्रिया भी शुरू होगी। इसके लिए रेलवे ने अपनी जियोग्राफिकल इंफारमेशन सिस्टम (जीआईएस) योजना को अमलीजामा पहनाना शुरू कर दिया है। रेलवे ने जीआईएस प्रोजेक्ट के लिए 36.24 करोड़ रुपये स्वीकृत कर दिए हैं।
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रेलवे बोर्ड ने सभी जोनल मुख्यालयों को पत्र लिखकर उनके यहां के स्टेशनों, उसके पास से गुजर रहीं सड़कों और नदियों सहित प्राकृतिक संसाधन के बारे में रिपोर्ट मांगी है।

सभी मंडल मुख्यालयों को सर्वे कर इस रिपोर्ट को जल्द ही मुख्यालयों को सौंपने के आदेश दे दिए गए हैं। अभी तक बड़े रेल हादसों से निपटने के लिए मंडल रेल प्रशासन के पास मौजूद क्रेन और दुर्घटना राहत ट्रेन की मदद ली जाती है।

जुलाई 2011 में कानपुर-इलाहाबाद रेलखंड पर कालका मेल हादसे में बचाव व राहत कार्य मिलने में देरी होने का मामला भी सामने आया था। बड़े पैमाने पर हुई जानमाल की हानि को देखते हुए रेलवे बोर्ड ने 2012 में जीआईएस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी।

इस प्रोजेक्ट के तहत रेलवे ने अपने सभी स्टेशनों पर मौजूद दुर्घटना बचाव ट्रेन, क्रेन व अन्य उपकरणों के साथ वहां से गुजरने वाली अंतरजनपदीय सड़क व राष्ट्रीय राजमार्ग, जंगल और नदियों सहित सभी तरह के प्राकृतिक संसाधनों का सर्वे कर उसकी रिपोर्ट मांगी है।

इस रिपोर्ट की मदद से रेलवे बोर्ड जीआईएस डाटा बेस और एक नक्शा तैयार करेगा। बोर्ड में आपदा व बचाव राहत का प्रशिक्षण हासिल करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की तैनाती के लिए एक सेल का गठन होगा।
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