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हाईस्कूल के बाद प्रमाणपत्रों में जन्मतिथि बदलवाने के लिए जाने ये अहम नियम

Tue, 07 Feb 2017 04:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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डेमो पिक
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हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ 60 वर्ष की उम्र के करीब पहुंचने पर रिटायर होने से पहले एक सहायक अध्यापिका के अपनी उम्र दो वर्ष कम करवाने की याचिका दायर खारिज कर दी। 
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हाईकोर्ट ने उप्र शिक्षा नियमावली के हवाले से कहा कि हाईस्कूल का परिणाम प्रकाशित होने के तीन वर्ष बाद उसमें जन्मतिथि सहित किसी त्रुटि का परिवर्तन नहीं कराया जा सकता, न ही उप्र सेवा भर्ती नियमों के अनुसार सेवा में आने के समय दर्ज जन्मतिथि को बाद में बदलवाया जा सकता है।

याचिका में कृष्णा चौधरी से गुजारिश की थी कि राजकीय छात्रा इंटर कॉलेज शाहमीना रोड की प्रिंसिपल को निर्देश देकर उनकी जन्मतिथि बदलवाई जाए। उन्होंने बताया था कि 1965 में  उन्होंने इस इंटर कॉलेज की कक्षा पांच में प्रवेश लिया था।  
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उन्होंने अपनी जन्मतिथि 25 नवंबर 1956 लिखी गई थी, जबकि असली जन्मतिथि 14 अगस्त 1954 थी। जब उन्होंने अपना ट्रांसफर सर्टिफिकेट निकलवाया था, तो उन्हें इसकी जानकारी हुई। उन्हाेंने इसे ठीक करवाने के लिए प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन सुधार नहीं हुआ।
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कोर्ट ने द‌िया ये जवाब

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बाद में कई दफा उन्होंने प्रिंसिपल को सुधार के प्रार्थना पत्र दिए, लेकिन कुछ नहीं हुआ। 12 जनवरी 2017 को उन्हाेंने इस सुधार के लिए इलाहाबाद स्थित यूपी माध्यमिक शिक्षा बोर्ड को भी लिखा। वहां से कोई जवाब नहीं आने पर वे हाईकोर्ट की शरण में आईं। 

जस्टिस अनिल कुमार ने अपने निर्णय में कहा कि कृष्णा चौधरी जनता गर्ल्स इंटर कॉलेज आलमबाग में सहायक अध्यापिका हैं और करीब 60 वर्ष की हैं। इस स्टेज पर उनके द्वारा मांगी गई राहत उन्हें नहीं दी जा सकती। शिक्षा नियमावली के चैप्टर-2, नियम छह के अनुसार परीक्षा परिणाम जारी होने के बाद उसमें किसी गलती का सुधार तीन वर्ष तक ही हो सकता है। 

याची के हाईस्कूल सर्टिफिकेट में जन्म वर्ष 1956 दर्ज है। वहीं उप्र सेवा भर्ती नियमों में जन्मतिथि निर्धारण के लिए नियम दो कहता है कि सरकारी कर्मचारी की जन्मतिथि हाईस्कूल या समकक्ष परीक्षा पास करने के सर्टिफिकेट के अनुसार होगी। 

अगर उन्होंने यह परीक्षा सेवा में आने के बाद पास की है तो सेवा में आते समय दर्ज करवाई जन्मतिथि को ही हमेशा माना जाएगा, उसी के अनुसार प्रमोशन, रिटायरमेंट और अन्य लाभ दिए जाएंगे। किसी अन्य प्रार्थना पत्र पर विचार नहीं होगा। इन दोनों के आधार पर हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।
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