राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल का मानना है कि आरएसएस ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। संघ ने संदेश देने की कोशिश कि है कि भले ही मुलायम सिंह और शरद यादव किसी भी राजनीतिक दल से रहे हों, लेकिन उनका सियासी कद बेहद कद्दावर था। हिंदी पट्टी में यादव जैसी मार्शल कौम का समर्थन मिल जाए तो इसका जबरदस्त लाभ हो सकता है। वरिष्ठ पत्रकार जेपी शुक्ला का मानना है कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद आरएसएस अपनी छवि में सुधार के लिए कई प्रयास कर रहा है। प्रतिनिधि सभा की बैठक में मुलायम और शरद यादव को श्रद्धांजलि देना भी उसी का हिस्सा है।
पांच वर्ष से कोशिश
भाजपा बीते पांच वर्ष से भाजपा यादव वोट बैंक में पकड़ बनाने में जुटी है। मुलायम सिंह को मरणोपरांत पद्म विभूषण दिया गया। पीएम मोदी ने भी उनके निधन के बाद उनसे जुड़ी यादों को ट्विटर पर साझा किया। इसके अलावा हरनाथ सिंह यादव को पार्टी ने राज्यसभा का सदस्य बनाया। सहकारिता के क्षेत्र में सपा नेता शिवपाल सिंह का पत्ता साफ करने के लिए पार्टी ने कभी उनके करीबी रहे संतराज यादव को ही चुना। संतराज यादव को सहकारिता में सक्रिय किया।
आजमगढ़ में सफल रहा है भाजपा का प्रयोग
आजमगढ़ को इटावा से बड़ा यादवों का गढ़ माना जाता है। आजमगढ़ लोकसभा उप चुनाव में भाजपा का दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ को प्रत्याशी बनाने का प्रयोग सफल रहा। मुलायम परिवार के धर्मेंद्र यादव के सामने भाजपा के दिनेश लाल यादव कुछ हद तक यादव वोट खींचने में सफल रहे। इससे पहले भाजपा आजमगढ़ में रमाकांत यादव को उम्मीदवार बनाकर भी चुनाव जीत चुकी है। रामपुर उप चुनाव में भाजपा की जीत को भी इसी रणनीति की आंशिक सफलता माना जाता है।
मुलायम को सम्मान, अखिलेश पर वार
यादव समाज में अखिलेश यादव के विरोधी यादव वोट बैंक को साधने की कोशिश का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विधानसभा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुलेमन से पूर्व सीएम मुलायम सिंह यादव और सपा विधायक शिवपाल सिंह यादव को सम्मान दिया। वहीं भ्रष्टाचार, अपराध और परिवारवाद के मुद्दे पर अखिलेश पर लगातार वार किए।