आरएसएसी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुधाकर शुक्ला की अगुवाई में वैज्ञानिक डॉ. राजीव, नीलेश, पल्लवी, ममता, वैभव, शाश्वत, सौरभ और सुजीत की टीम ने 21 से 24 अक्तूबर के बीच शहर के 110 वाडों और सभी आठ जोन में 282 स्थानों पर मानसून बाद हवा की गुणवत्ता जांची।
पोर्टेबल एक्यूआई डिटेक्टर से जुटाए गए आंकड़ों में सामने आया कि मानसून की विदाई और दिवाली के बाद कई इलाकों में वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्सआई) 400 से ऊपर पहुंच गया था। यह स्तर स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। दिवाली की रात और उसके अगले दिन जलाए गए पटाखों की वजह से राजधानी में शोर का स्तर 893 डेसिबल तक पहुंच गया। शोर का यह स्तर बुजुर्गों, दिल के मरीजों और पशु-पक्षियों के लिए बेहद घातक और भयावह है।
दिवाली पर हरे भरे कैंट की भी हवा बिगड़ी
सर्वे के मुताबिक अलीगंज, अमीनाबाद, चौक और विकासनगर जैसे घनी आबादी वाले इलाके वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। औद्योगिक क्षेत्र तालकटोरा में भी प्रदूषण का स्तर भयावह रूप ले चुका है। हरियाली की वजह से साफ हवा वाले कैंट इलाके की स्थिति भी अब पहले जैसी नहीं रही।
खतरनाक स्तर पर है वायु प्रदूषण।
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राजधानी दिल्ली समेत कई राज्यों की सरकारें प्रदूषण घटाने के लिए कृत्रिम बारिश के विकल्प पर विचार कर रही हैं। आरएसएसी के वैज्ञानिकों ने चेताया कि प्रदूषण घटाने के लिए सिल्वर आयोडाइड यौगिक से कृत्रिम बारिश कराने का तरीका बच्चों के लिए घातक साबित हो सकता है। यह खतरनाक यौगिक मिट्टी, पानी और वातावरण में स्थाई तौर पर जमा होकर त्वचा और श्वास संबंधी रोगों व समस्याओं को बढ़ा सकता है।
सिर्फ छह सेंटरों से नहीं मापी जा सकती हवा की सच्चाई: वैज्ञानिक
वैज्ञानिकों ने माना है कि सिर्फ छह एक्यूआई मॉनीटरिंग सेंटर पर्याप्त नहीं। शहर के अधिक से अधिक इलाकों में नए एक्यूआई मॉनीटरिंग सेंटर बनाए जाएं। इससे हर वार्ड में वायु प्रदूषण की सटीक तस्वीर सामने आएगी। इसके साथ ही आम लोगों को भी प्रदूषण रोकथाम के लिए सजग होना पड़ेगा। औद्योगिक उत्सर्जन, वाहनों के प्रदूषण की जांच, सही ट्रैफिक व्यवस्था, दिवाली पर पटाखों का सीमित उपयोग के साथ हरियाली को और बढ़ाना होगा।