प्रवेंद्र गुप्ता
लखनऊ। नगर निगम के मुख्य अभियंता तो कहते हैं, कोई भी सड़क कम से कम पांच साल चलनी चाहिए, लेकिन पांच साल पहले कौन-कौन सी सड़कें बनी थीं, नगर निगम में इसका कोई रिकाॅर्ड ही नहीं है। इसको लेकर रोड रजिस्टर बनाया जाना था, जो तैयार नहीं हो पाया। ऐसे में ठेकेदार और इंजीनियर अपने फायदे के लिए सही सलामत सड़कों को बना रहे हैं।
ऐसे मामले पहले पकड़े गए थे। उसके बाद भी अंकुश नहीं लगा। महापौर सुषमा खर्कवाल ने भी इस गड़बड़झाला को पकड़ा। मंगलवार को कार्यकारिणी में उन्होंने यह मामला उठाया भी था। बुधवार को फैजुल्लागंज तृतीय वार्ड में जाकर उन्होंने एक सड़क की जांच भी की। अब इस मामले में जिम्मेदार इंजीनियर पर कार्रवाई हो सकती है। इसको लेकर जवाब तलब किया गया है।
नगर निगम मेंं सड़कों के निर्माण में काफी गड़बड़झाला होता है। बनी सड़कें दोबारा कागज पर बन जाती हैं और टूटी सड़कों के लिए बजट की कमी का रोना रहता है। एक ही सड़क को कभी रामू के मकान से श्यामू के मकान तक तो कभी कल्लू के घर से लल्लू के घर बना दिया जाता है। यदि रोड रजिस्टर बन जाए, तो इस सब पर अंकुश लग जाए। रोड रजिस्टर की पुरानी व्यवस्था को लागू करने की कवायद एक साल से हो रही है, लेकिन पूरी नहीं हो पा रही है।
मनमानी की कहानी बताते हैं ये मामले
केस :1
2023 : इस्माइलगंज द्वितीय वार्ड की गहमर कुंज काॅलोनी में एक ऐसी सड़क को फिर से बनाने का मामला सामने आया जो एकदम दुरुस्त हालत में थी। इसके बाद काम को रोका गया था। ऐसे मामले दोबारा न हों इसलिए रोड रजिस्टर बनाने की बात अफसरों ने कहीं थी। पर, अब तक यह रजिस्टर तैयार नहीं हो पाया।
केस : 2
2022 : अयोध्या रोड की स्वप्न लोक काॅलोनी से गोविंद विहार तक करीब 20 लाख रुपये की लागत से सड़क बनाई गई थी। इस सड़क को 2027 तक चलना चाहिए था, लेकिन यह दो साल बाद ही खराब हो गई। इसको ठीक करने पर नगर निगम ने दोबारा करीब पांच लाख रुपये खर्च किए, जबकि ठेकेदार को बनाना चाहिए था।
हर साल करीब 600 करोड़ रुपये नगर निगम खर्च करता है सड़कों पर
नगर निगम हर साल करीब 600 करोड़ रुपये सड़कों के निर्माण पर खर्च करता है। सड़क निर्माण की फाइलें ठेकेदार लिए घूमते रहते हैँ। वे भुगतान होने के बाद भी फाइल वापस नहीं करते। तीन महीने पहले नगर निगम में ई ऑफिस सिस्टम लागू होने के बाद फाइलें अपलोड हो रही हैं, मगर उससे पहले का डेटा नहीं है।
नगर निगम के मुख्य अभियंता महेश वर्मा का कहना है कि तीन साल के दौरान बनी सड़कों का रोड रजिस्टर तैयार हो गया है। बाकी का भी तैयार किया जा रहा है। सड़कों को दोबारा बनाने जैसी कोई बात नहीं है। पार्षद कोटे में वहीं पर काम कराए जाते हैं, जिसका प्रस्ताव वे देते हैं। यह हो सकता है कि बहुत जरूरी सड़क का प्रस्ताव न आया हो।