सड़क निर्माण से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते बेमौसम व असामान्य बारिश, पहाड़ों पर लैंड स्लाइड, बाढ़ और बढ़ते तापमान के चलते सड़कें खराब हो रही हैं। इससे धन व जन की हानि हो रही है। ऐसे में मौसम में बदलावों को देखते हुए सड़क निर्माण की तकनीक में भी बदलाव की जरूरत है।
राजधानी में चार दिनी 81वें इंडियन रोड कांग्रेस के दूसरे दिन रविवार को आपदा में सड़कों के प्रबंधन पर आयोजित कार्यशाला में शामिल देश-विदेश के विशेषज्ञों ने इस पर अपनी रिपोर्ट पेश की। अरुणाचल सरकार के तकनीकी सलाहकार केसी ढिमोले ने बताया कि अरुणाचल में सड़कों के निर्माण से पहले मौसमी प्रभाव का अध्ययन किया जाता है। लैंड स्लाइड, स्लोप आदि को लेकर विशेष जांच की जाती है।
पहाड़ों पर गुरुत्वाकर्षण असंतुलन का भी असर
जापान इंट्रेक्टिव कॉरपोरेशन एजेंसी के प्रतिनिधि योशीनोरी ने बताया कि पहाड़ों की सड़कों पर गुरुत्वाकर्षण असंतुलन का सबसे अधिक असर पड़ रहा है। अब ऐसे सिस्टम बनाने की जरूरत है कि जिससे कि इसकी जानकारी पहले ही मिल जाए। इसको लेकर जापान सरकार भारत को तकनीकी मदद दे रही है। उन्होंने कहा कि टनल रोड निर्माण में सबसे अधिक सुरक्षा की जरूरत है। इसके लिए उसकी डिजाइन पर विशेष सतर्कता की जरूरत है। लाइटिंग, वेंटीलेशन और इलेक्ट्रिक सिस्टम को भी बेहतर बनाना होगा।
सात दिन तापमान का अध्ययन कर बनाएं सड़क
दिल्ली आईआईटी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अरविंद स्वामी ने बताया कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते तापमान बढ़ रहा है। ऐसे में जहां तापमान ज्यादा बढ़ता है, वहां सड़क निर्माण से पहले कम से कम सात दिन तक तापमान जांचना चाहिए। तापमान का निष्कर्ष निकालने के बाद उसके अनुसार ही बिटुमिन डाला जाना चाहिए, जो अधिक तापमान पर पिघलने से खराब न हो। अभी तापमान को ध्यान में रखकर सड़कों का निर्माण नहीं किया जा रहा है। ऐसे में जब तापमान बढ़ता है तो सड़कें जल्दी खराब होती हैं।