समिट में जानकारी देते प्रो. वेद प्रकाश व अन्य।
लखनऊ। पल्मोनरी हाइपरटेंशन का पता अक्सर दो साल की देरी से चलता है। सांस फूलना इसका पहला संकेत हो सकता है। समय पर जांच और सही इलाज से जान बचाई जा सकती है। यह जानकारी रविवार को डॉ. वेद प्रकाश ने साझा की। संस्थान में पल्मोनरी एवं क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग ने पीएच समिट का समापन हुआ।
डॉ. वेद ने कहा कि तीन साल में जीवित रहने की संभावना सिर्फ 55 फीसदी रह जाती है। गंभीर मामलों में हृदय-फेफड़े का प्रत्यारोपण ही अंतिम विकल्प है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में पल्मोनरी हाइपरटेंशन का प्रसार प्रति लाख पर 0.15 है। यह बीमारी महिलाओं में पुरुषों से दो से चार गुना अधिक होती है। कार्यशाला में कुल 92 डॉक्टरों को प्रशिक्षण दिया गया। डॉ. अमित आनंद के नेतृत्व में 30 डॉक्टरों ने इकोकार्डियोग्राफी का कार्य सीखा। डॉ. वेद प्रकाश ने 28 प्रतिभागियों को दाहिने हृदय के कैथीटेराइजेशन का प्रशिक्षण दिया। समिट का उद्देश्य नए शोध को सीधे मरीजों के इलाज तक पहुंचाना था।