प्रदेश के सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक अपराधों की तफ्तीश में यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली से नाखुश हैं। वे मानते हैं कि मोहनलालगंज कांड में जल्दबाजी और बड़बोलेपन से पुलिस की साख को धक्का लगा है, उसकी विश्वसनीयता गिरी है।
फॉरेंसिक जांच रिपोर्ट आने से पहले पुलिस को केस के पूर्ण खुलासे के दावों से बचना चाहिए था। महिला के साथ गैंगरेप और हत्यारों की तादाद एक से ज्यादा होने के सवालों पर डायलॉग जरूरी था।
मोहनलालगंज में महिला से रेप और बेरहमी से हत्या की सनसनीखेज वारदात की जांच से जुड़े पुलिस अफसरों के अंतर्विरोधी बयानों और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चूक सामने आने पर पूरे केस की तफ्तीश पर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल रिटायर्ड पुलिस अफसर भी उठा रहे हैं।
पूर्व डीजीपी ने उठाया सवाल
पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता कहते हैं कि मोहनलालगंज कांड के खुलासे में पुलिस ने जल्दबाजी की, बड़बोलापन दिखाया। मीडिया कोई सवाल उठाता है तो उन्हीं से मदद मांगिए। इनके इश्यू को देखिए, उसका परीक्षण कराइए।
ऐसे ही सवाल उठे थे कि हत्यारे एक से ज्यादा थे। पुलिस को ऐसे तर्क देने वालों से चर्चा करनी चाहिए थी। पता करना चाहिए था कि एक से ज्यादा हत्यारे या रेपिस्ट और हत्यारे होने को लेकर उनके क्या तर्क हैं?
जो दमदार तथ्य हाथ लगते उनका परीक्षण कराया जाता। वहीं पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कहते हैं कि पुलिस की तफ्तीश सही न होने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि विभागीय अफसरों, कर्मियों में प्रोफेशनल दक्षता की कमी मानते हैं।
उनका कहना है कि दक्षता इसलिए कम हो रही है कि इनके आधार पर तरक्की और पोस्टिंग नहीं मिलती।
कैसे निकाल लिया रेप न होने का निष्कर्ष?
सेवानिवृत्त पुलिस महानिदेशक केएल गुप्ता का मानना है कि मोहनलालगंज कांड में कई स्तरों पर चूक हूई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में डॉक्टरों की लापरवाही लग रही है। महिला ने एक किडनी अपने पति को डोनेट की थी। फिर भी, लाश में दो किडनी दर्शाना मेडिकल लैप्स है।
यही हाल तफ्तीश के स्तर पर रहा। पुलिस की जांच ने बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला यही कि महिला का हत्यारा केवल एक होने की बात पर पुलिस क्यों अड़ी हुई थी?
फॉरेंसिक रिपोर्ट के बिना रेप न होने का निष्कर्ष कैसे निकाल लिया? मुझे नहीं लगता कि पुलिस का केस के खुलासे में कोई निजी हित होगा या उस पर दबाव रहा होगा, शायद अफसर खुद ही सरकार को बदनामी से बचाना चाहते हों। इसी सोच ने सरकार की ज्यादा फजीहत करा दी।
सीबीआई में पुलिस जैसे अफसर
महानिदेशक केएल गुप्ता ने कहा कि किसी भी केस में सीबीआई जांच की मांग इसीलिए उठती है कि पुलिस की तफ्तीश से लोग संतुष्ट नहीं होते। सीबीआई में भी पुलिस जैसे अफसर ही होते हैं लेकिन तफ्तीश में दखल और सियासी दबाव न होने के कारण लोग उस पर विश्वास करते हैं। जल्दी केस खोलने का दबाव और प्रोफेशनल एप्रोच की कमी से भी जांच प्रभावित होती है।
तैनाती के लिए राइट मैन ऑन राइट स्पॉट
केएल गुप्ता कहते हैं कि यूपी पुलिस की दिक्कत यह है कि नेताओं का दखल बहुत बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश के बावजूद डीएम, एसपी या थानेदार दो साल नहीं टिक पाते। यूपी पुलिस में कई अफसर अच्छे हैं। बहुत सारे लोग किनारे पड़े हैं। जरूरत है कि ‘राइट मैन-ऑन राइट स्पॉट’ हो।
यह होना चाहिए था
पुलिस का स्टैंड साफ होना चाहिए था। ठंडे दिगाम से तफ्तीश करनी चाहिए थी। कहना चाहिए था कि रेपिस्ट हो या हत्यारा एक हो या चार, जांच कर सच्चाई सामने लाई जाएगी। पूरे सुबूत मिले बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए था। जांच के दौरान अपराध को लेकर कोई नया आइडिया या नया एंगल सामने आ रहा है तो उसका परीक्षण कराया जाना चाहिए।
नेताओं की जी हुजूरी करते हैं पुलिस अफसर
पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह कहते हैं कि किसी घटना में राज्य सरकार कठघरे में दिखाई पड़ती है तो जांच का कोण ही बदल जाता है। पुलिस का ध्यान मूल काम पर कम, सियासी संबंध निकालने पर ज्यादा रहता है।
वे राजनीतिक संरक्षक तलाशने लगते हैं। तबादला-पोस्टिंग के बदले वे सियासी संरक्षकों के हित साधते हैं। जहां राज्य सरकार और सत्ता पक्ष के प्रभावी लोग कठघरे में हों, वहां नजरिया बदलने के पीछे वजह भी है। पुलिस को पता होता है कि सही जांच करेंगे तो सरकार गर्दन पकड़ लेगी। लिहाजा जांच पटरी से उतरकर कहीं और चली जाती हैं।
ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि सरकार सीधे तौर पर कहीं फंसी नजर न आए। मोहनलालगंज कांड में भी सरकार कठघरे में घिर रही थी। जब पुलिसकर्मी ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए सियासी गॉड फादर ढूढेंगे तो सही तफ्तीश की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
जल्दबाजी में नहीं होती गहराई से छानबीन
सेवानिवृत्त डीजीपी श्रीराम अरुण का कहना है कि कोई केस पूरी प्रक्रिया से गुजरता है। हर स्टेप पर चूक की आशंका रहती है। किसी भी घटना की चूल से चूल मिलाने में वक्त लगता है।
किसी भी जघन्य वारदात की जल्दबाजी में गहराई से छानबीन नहीं हो सकती। पुलिस के पास काम का दबाव होता है। साथ ही मीडिया, समाज और स्थानीय लोगों का दबाव रहता है।
ऐसे में जल्दबाजी में केस खोलने में चूक होती है। हालांकि नई टेक्नोलॉजी आने से जांच की वैज्ञानिक प्रमाणिकता बढ़ी है। फिर भी एफआईआर, पंचनामा, पोस्टमार्टम और तफ्तीश, हर स्तर पर चूक की संभावना रहती है।
दबाव में हुआ आधा-अधूरा खुलासा
रिटायर्ड पुलिस महानिरीक्षक एसआर दारापुरी कहते हैं कि मोहनलालगंज कांड में दबाव के चलते पुलिस ने सारे साक्ष्य हाथ में आए बिना घटना का खुलासा कर दिया। दबाव में होने वाली तफ्तीश न्याय हित में नहीं होती। बड़ी घटनाओं में पुलिस पर सरकार, राजनीति और मीडिया का दबाव रहता है।
मुख्यमंत्री भी चाहते हैं कि घटना का जल्द से जल्द खुलासा हो। व्यवहार में ऐसा संभव नहीं हो पाता। इसी मामले में देखिए, फॉरेंसिक लेबोरेटरी की रिपोर्ट हाथ में नहीं थी और पुलिस ने केस खोल दिया। दावे भी मजबूती से किए गए। यह भी कह दिया गया कि महिला से रेप नहीं हुआ।
रेप हुआ या नहीं, यह लाइन फॉरेंसिक रिपोर्ट के बाद तय होनी चाहिए थी। जब किसी केस की जांच गलत होती है तो पुलिस पर अविश्वास बढ़ता है। सीबीआई इसीलिए सही जांच कर लेती है कि उस पर दबाव नहीं होता, उसके पास वक्त और संसाधन भी होते हैं।