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महज कागजों पर दौड़ती रहीं अखिलेश की योजनाएं

Mon, 23 Jun 2014 10:03 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अकसर यह कहते रहे हैं कि उनकी सरकार ने अच्छी-अच्छी योजनाएं बनाईं, फिर भी लोकसभा चुनाव में उन्हें जनता का अपेक्षित समर्थन नहीं मिला, क्योंकि उन योजनाओं के बारे में प्रचार-प्रसार नहीं किया जा सका।
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सूबे के आला अधिकारियों ने इसकी हकीकत भले ही उनके सामने नहीं रखी हो लेकिन भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने इस पर से परदा हटाया है।

सीएजी रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि प्रदेश सरकार की लाखों करोड़ रुपये की योजनाएं जमीन पर ही नहीं उतरीं, जिनके बारे में बड़े-बड़े विकास के दावे किए गए थे।

किसानों, नौजवानों और युवाओं के साथ स्कूल, अस्पताल जैसी आम जनता से जुड़ी तमाम परियोजनाएं महज प्रस्ताव से आगे नहीं बढ़ पाईं।

76 योजनाओं पर पैसे ही नहीं हो पाए खर्च

मौजूदा बजट सत्र में पेश इस रिपोर्ट से साफ है कि सरकार का जोशखरोश अपनी ही योजनाओं के क्रियान्वयन में पहले ही साल फेल साबित हुआ।

करीब 190 योजनाओं में 4,062 करोड़ रुपये बिना खर्च के वापस कर देने पड़े। इनमें कई योजनाओं के पैसे वापस करने की वाजिब वजहें भी हैं।

पर, हैरान करने वाली बात ये है कि ऐसी योजनाएं बड़ी संख्या में हैं, जो जमीन पर सिर्फ इसलिए नहीं उतर सकीं क्योंकि उसके लिए संबंधित विभाग प्रस्ताव तक तैयार नहीं करा सका।

वहीं 76 योजनाएं तो ऐसी मिलीं जिनके लिए मंजूर बजट की पूरी की पूरी रकम बिना खर्च किए वापस कर देनी पड़ी।

अगर सरकार इन पर काम कर पाती तो 1,168 करोड़ रुपये के विकास जमीन पर नजर आते। हो सकता है तब चुनाव में कुछ और क्षेत्रों में सत्ताधारी दल जनता का विश्वास हासिल कर जाता।

सीएजी रिपोर्ट में हुआ है खुलासा

सीएजी रिपोर्ट में 2012-13 की परियोजनावार खर्च की पड़ताल हुई तो तमाम चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। इस तथ्य का खुलासा होने के बाद सरकार शायद इस हकीकत को समझेगी।

यहां सवाल ये है कि क्या बिना औचित्यपूर्ण प्रस्ताव प्राप्त किए ही विधानमंडल से योजनाएं मंजूर करवा ली जाती हैं? या बजट स्वीकृति में कुछ हेरफेर के बाद उसमें जरूरी संशोधन तक करने में अफसर पूरा वित्तीय वर्ष गुजार देते हैं।

दूसरा, जिन योजनाओं के लिए बजट तक मंजूर हो गया बाद में उसके कार्ययोजना को अनुमोदन मिलने में साल कैसे बीत जाता है? सीएजी रिपोर्ट में ऐसी परियोजनाओं की भरमार है जो अफसरों की शिथिलता की वजह से जमीन पर नहीं उतर पाई।

बस प्रचार करते रहे वर्चुअल क्लास रूम का

प्रदेश सरकार ने राजकीय पालीटेक्निक संस्थानों में सुविधाओं के विकास व सुदृढ़ीकरण और वर्चुअल क्लास रूम की स्थापना के लिए क्रमश: चार करोड़ व एक करोड़ रुपये का बजट प्रावधान हुआ था।

लेकिन पूरी रकम लौटा देनी पड़ी। इसकी वजह बताई गई कि साल बीत गया पर वित्तीय स्वीकृति जारी नहीं हो सकी।

जब किसानों की फिक्र हो तब तो मांगे बजट
प्रदेश सरकार ने बजट में नहरों के लिए विभिन्न मदों में बड़ी रकम का प्रावधान किया था। इसके बावजूद विभाग करीब एक दर्जन परियोजनाओं के लिए मंजूर बजट को खर्च करने की मांग तक नहीं कर सका।
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मत्स्य महाविद्यालय नहीं खुल सका

फैजाबाद के कृषि विश्वविद्यालय के अंतर्गत सरकार ने वर्ष 2012-13 में मत्स्य महाविद्यालय की स्थापना के लिए 6.98 लाख रुपये बजट का प्रावधान किया था। इस काम के लिए प्रस्ताव ही नहीं आ सका और योजना धरी की धरी रह गई।

काम कराने की दर नहीं तय कर पाए
सरकार ने बुंदेलखंड क्षेत्र में सिंचाई व वर्षा जल संचयन योजना को लागू करने के लिए 18.59 करोड़ रुपये का बजट दिया था। पर इसके काम किस दर पर कराए जाएं, इसका अनुमोदन न होने कारण बुंदेलखंड के लोगों तक इस रकम का लाभ नहीं पहुंच सका।

योजनाओं का प्रचार भी नहीं कर सके
सरकार ने किसान सेवा रथ चलाने का फैसला किया था। इसके लिए 30.50 करोड़ रुपये मंजूर किया गया था, लेकिन इसका 62 फीसदी हिस्सा सरकार खर्च नहीं कर पाई। 
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