भूमि पर उच्च न्यायालय के स्थगनादेश को तीन महीने बीत चुके थे। हिंदुओं की तरफ से मंदिर निर्माण शुरू करने का दबाव बढ़ता जा रहा था। एक तरफ न्यायालय के स्थगनादेश तो दूसरी तरफ जनादेश और जनभावनाएं, असमंजस में फंसी कल्याण सिंह सरकार, विहिप और संत समाज।
आखिरकार सोची-समझी रणनीति के तहत विहिप के मार्गदर्शक मंडल की अयोध्या में बैठक बुलाई गई। बैठक के बाद घोषणा की गई कि विवादित ढांचा राम जन्मभूमि ही है, इसलिए उसे गिराने का सवाल ही नहीं है। सिर्फ जीर्णोद्धार कराया जाएगा। इसके लिए राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण समिति का नाम बदलकर राम मंदिर जीर्णोद्धार समिति कर दिया गया।
कल्याण को बधाई: जीर्णोद्धार समिति ने कल्याण सिंह सरकार को बधाई दी और कहा कि उसने मंदिर निर्माण में आने वाली सारी बाधाओं को दूर कर दिया है। साथ ही 9 जुलाई 1992 से 60 दिनों का सर्वदेव अनुष्ठान शुरू करने की घोषणा की। संतों और लोगों से कारसेवा के लिए अयोध्या आने का आह्वान किया गया। 9 जुलाई से यह अनुष्ठान और मंदिर की नींव के चबूतरे की ढलाई शुरू करा दी गई। कल्याण सांसत में थे।
एक तरफ यथास्थिति बनाए रखने का अदालत का निर्देश, दूसरी तरफ जनाकांक्षा। विहिप को रोकने से उनकी खुद की रामभक्त और हिंदूवादी नेता की छवि पर आंच आने का खतरा। उधर, अयोध्या में शुरू हुए पूजन और नींव भराई पर संसद में हंगामा रुकने का नाम नहीं ले रहा था। प्रधानमंत्री राव ने घोषणा की, न मस्जिद गिरने देंगे और न गिराने देंगे।
कल्याण ने प्रधानमंत्री राव को पत्र लिखकर संतों से कारसेवा रोकने की अपील करने का आग्रह किया। राव ने संतों को तीन महीने में मंदिर-मस्जिद मुद्दे का समाधान करने का आश्वासन दिया और कारसेवा रुकवाई।
संघ परिवार में शुरू हुई खींचतान
तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह संतों से जब कारसेवा रोकने की अपील कर रहे थे, उसी दरम्यान भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने अयोध्या जाकर निर्माण जारी रखने की घोषणा की। उधर, कारसेवा रुकी और इधर भाजपा के भीतर कल्याण सिंह को लेकर एक तत्कालीन केंद्रीय नेता के इशारे पर विधायकों से हस्ताक्षर अभियान शुरू करा दिया गया।
जुलाई से अक्तूबर आ गया लेकिन प्रधानमंत्री की तरफ से कोई समाधान न आने पर संतों की नाराजगी और बेचैनी बढ़ती जा रही थी। विहिप नेता अशोक सिंहल भी कारसेवा रोकने से क्षुब्ध बैठे थे। आखिरकर 30 अक्तूबर 1992 को फिर धर्मसंसद की बैठक दिल्ली में बुलाई गई। इससे चिंतित प्रधानमंत्री राव ने और तीन महीने की मोहलत मांगी।
कल्याण ने राव को और तीन महीने की मोहलत देने के पक्ष में बयान दिया, लेकिन डॉ. जोशी ने कहा कि इसका कोई औचित्य नहीं है। अशोक सिंहल भी मोहलत देने के विरोधी थे। आखिरकार धर्मसंसद ने 6 दिसंबर 1992 को कारसेवा की घोषणा कर दी।
6 और 11 का फेर
भाजपा सरकार, संतों और विहिप के पदाधिकारियों ने न्यायालय से भूमि अधिग्रहण मामले की सुनवाई जल्द पूरी करके 6 दिसंबर से पहले फैसला देने की अपील की। न्यायालय के तत्कालीन अतिरिक्त रजिस्ट्रार आलोक कुमार सिंह ने 3 दिसंबर 1992 को घोषणा की कि अयोध्या मामले में भूमि अधिग्रहण पर 11 दिसंबर को निर्णय सुनाया जाएगा।