भातखंडे में लोगों से मुलाकात करते पं. जसराज। (फाइल फोटो)
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गायकी के सरताज पंडित जसराज फरवरी 2011 की गुलाबी सर्दियों में लखनऊ आए थे। सफेद बारादरी में जब उन्होंने राग छेड़ा तो लगभग 90 मिनट तक श्रोता उनकी गायकी के मोहपाश में बंधे रहे। सुनने वालों में अगली पंक्ति में कई नौकरशाहों के अलावा नगर के कलाकार और संगीत प्रेमी शिक्षक और छात्र भी थे।
मौका था भातखंडे संगीत संस्थान विश्वविद्यालय के पहले दीक्षांत समारोह का। आयोजन की यादें साझा करते हुए भातखंडे के संगीत प्रवक्ता डॉ. कमलेश दुबे ने बताया कि दीक्षांत समारोह पहला था, उसे यादगार बनाना था। इसलिए मुख्य अतिथि के तौर पर पंडितजी से समय मांगा गया।
दोपहर बाद से देर शाम तक चले समारोह में उन्होंने बच्चों को अपने हाथों से पदक और उपाधियां बाटीं। संबोधन के बाद जब उनका गायन शुरू हुआ तो श्रोता मंत्रमुग्ध होकर उन्हें सुनते रहे। लगभग 90 मिनट तक उन्होंने गायन प्रस्तुतियां दीं। राग केदार के अलावा पांच सात छोटी-बड़ी बंदिशों के अलावा कुछ अपना भी उन्होंने सुनाया। तब उन्हें सारंगी पर हमारे साथी दिवंगत पंडित विनोद मिश्रा ने संगत दी।