चंद्रभानु गुप्त उत्तर प्रदेश के तीसरे मुख्यमंत्री थे। उनका जन्म मूल रूप से अलीगढ़ में हुआ था। पर, उनके बचपन का ज्यादातर समय लखीमपुर खीरी में बीता। गुप्त के बड़े भाई डॉ. प्यारेलाल लखीमपुर खीरी में जेल में डॉक्टर थे। लखनऊ के महापौर एवं विधान परिषद सदस्य रहे स्व. डॉ. दाऊजी गुप्त ने एक बार गुप्त का किस्सा मुझे सुनाया था।
किस्सा कुछ यूं है कि 1916 में लखनऊ में कांग्रेस का अधिवेशन था। चंद्रभानु गुप्त जी ने बड़े भाई डॉ. प्यारेलाल से लखनऊ आने की अनुमति मांगी। पर, उन्होंने मना कर दिया। गुप्त जी की अधिवेशन में शामिल होने की बड़ी इच्छा थी, क्योंकि उसमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक आ रहे थे। हालांकि, अधिवेशन में महात्मा गांधी भी शामिल होने के लिए आ रहे थे। पर, उस समय तक गांधी जी का नाम बहुत चर्चित नहीं हुआ था।
यह अधिवेशन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि 1907 में सूरत में कांग्रेस अधिवेशन में हुई फूट के बाद पहली बार लखनऊ में इस अधिवेशन में नरम एवं गरम दल वाले नेता एक साथ बैठने जा रहे थे। बड़े भाई प्यारेलाल जी से अनुमति नहीं मिली तो
उन्होंने किसी से 5 रुपये उधार लिए और लखीमपुर खीरी से लखनऊ आ गए।
लखनऊ में वह गणेशगंज स्थित आर्यकुमार सभा के दफ्तर में ठहरे। डॉ. प्यारेलाल भी अधिवेशन में हिस्सा लेने लखनऊ आए थे। उन्हें जब मालूम हुआ कि चंद्रभानु घर से चुपचाप निकलकर इसी अधिवेशन को देखने आए हैं, तो वह आर्यकुमार दफ्तर
पहुंचे और उन्हें अपने साथ ले गए। इस अधिवेशन का गुप्त पर ऐसा असर हुआ कि उन्होंने आगे चलकर लखनऊ को ही अपनी कर्मभूमि बना ली। वे प्रदेश के मुख्यमंत्री भी हुए। डॉ. दाऊ जी बताते थे कि गुप्त जी से मिलने जब भी कोई लखीमपुर खीरी से आ जाता तो वे कहते, अरे भाई मैं तो वहां का कर्जदार हूं।