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UP: संघ के 'मरहम' से भाजपा का 'घाव' भरने की जुगत... इसलिए RSS ने की है तरफदारी; भाजपा के सामने ये दुविधा भी

Thu, 05 Sep 2024 09:49 AM IST
शाहरुख खान सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला, लखनऊ

सार

संघ के 'मरहम' से भाजपा का 'घाव' भरने की जुगत है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जातिगत जनगणना की तरफदारी कर 'डैमेज कंट्रोल' में जुटा है। इस मुद्दे के जरिए लोकसभा चुनाव में हुए नुकसान की भरपाई की कवायद है।
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Rashtriya Swayamsevak Sangh - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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केरल में आयोजित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसस) की की समन्वय बैठक में जातिगत जनगणना को लेकर प्रदेश में नई बहस छिड़ गई है। संघ के बयान को लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले हार के 'घाव' को भरने के लिए 'मरहम' के तौर पर देखा जा रहा है। 
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इस मुद्दे पर संघ ने जिस तरह से पहली बार खुलकर तरफदारी की है, उससे स्पष्ट है कि अब आगे संघ और भाजपा कोई जोखिम नहीं लेना चाहतें हैं। माना जा रहा है कि लोकसभा चुनाव में पिछड़े वोट बैंक के खिसकने से सकते में आई भाजपा भी संघ के इस बयान के बाद अब इस मुद्दे पर 'फ्रंटफुट' पर आकर खेलेगी। 

अब तक इस मुद्दे से कन्नी काटने वाली भाजपा अब 'डैमेज कंट्रोल' में जुट गई है। दरअसल भाजपा के हर सियासी एजेंडे को पूरा कराने में संघ परिवार की बड़ी भूमिका होती है, लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव में अति आत्म विश्वास से लबरेज भाजपा संगठन ने संघ परिवार को उतना तरजीह नहीं दिया। लिहाजा इसका खामियाजा भी भाजपा को भुगतना पड़ा है। 
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2024 के चुनाव में जिस तरीके से भाजपा को नुकसान हुआ है, उससे भाजपा पर दबाव बढ़ा है। चुनाव नतीजों ने भाजपा को ही नहीं, संघ को भी झकझोर कर रख दिया था। संघ और भाजपा की चिंता यह है कि लोकसभा चुनाव में दलितों-पिछड़ों ने जिस तरह से वोट की ताकत दिखाई, वो भाजपा के लिए बड़ा खतरा है। 
 

इसे नहीं रोका गया तो 90 के दशक की गैर भाजपाई-गठबंधन सरकारों का दौर लौट सकता है। उसको रोकने के लिए एक तरीके से संघ को मजबूरन इस मुद्दे पर स्टैंड लेना पड़ा है। दखा जाए तो अब तक भाजपा इस मुद्दे पर बयानबाजी से बचती रही है। 

 

हालांकि एनडीए के सहयोगी सुभासपा अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर, अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जैसे पिछड़े चेहरे इस मुद्दे तरफदारी जरूर करते रहे हैं। ऐसे में अब संघ का भी जातिगत जनगणना के सियासी जंग में कूदना भाजपा की सियायत के लिए अहम कदम माना जा रहा है।

 

केरल की बैठक में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने पहली बार जातिगत जनगणना को देश की एकता-अखंडता के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बताते हुए इसे गंभीरता से लेने और इस पर राजनीति न करने की बात कहकर स्पष्ट संकेत दे दिया है कि संघ और भाजपा इस मुद्दे को विपक्ष के हाथ में नहीं जाने देना चाहती है।

... तो इसलिए भी संघ ने की है तरफदारी
संघ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि हाल के दिनों जब जातिगत जनगणना की मांग ने जोर पकड़ी तो संघ से भी इस पर सावल पूछे गए । हालांकि संघ जाति-विहीन समाज की बात कहते हुए एक तरीके से इस मुद्दे पर उदासीन रहा और न तो इसका समर्थन किया और न ही विरोध।

पर अब जातीय जनगणना की तरफदारी करने के पीछे जो कारण बताया जा रहा है वह यह है कि हाल के दिनों में जिस तरह संघ को आरक्षण या जातीय जनगणना का विरोधी साबित करने की कोशिश हो रही थी, संघ उस पर अपना रुख साफ करना चाह रहा था. जातीय जनगणना के समर्थन को इससे जोड़कर देख सकते हैं। इस स्टैंड के जरिये संघ भी समाज के निचले तबके में अपनी पैठ और मजबूत करना चाहता है।

 

संघ के बयान में छिपी है रणनीति
जातिगत जनगणना को लेकर संघ ने स्पष्ट राय रखी है कि कौन सी जाति किस मामले में पिछड़ गई है, किन समुदाय पर विशेष ध्यान की जरूरत है, इन चीजों के लिए कई बार सरकार को उनकी संख्या की जरूरत पड़ती है. ऐसा पहले भी हो चुका है।

जातिगत नंबर का इस्तेमाल उनकी भलाई के लिए किया जा सकता है. न कि इसे चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए और राजनीति के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। इसलिए माना जा रहा है कि अब भाजपा आगे की सियासत में संघ की राय के मुताबिक अगली रणनीति तैयार कर 'डैमेज कंट्रोल' करेगी।

 

चुनाव में नुकसान से बढ़ा दबाव
कांग्रेस, आरजेडी, समाजवादी पार्टी जैसी विपक्षी पार्टियां तो जातिगत जनगणना की मांग कर ही रही हैं. बीजेपी के सहयोगी दल भी जातीय जनगणना को लेकर मुखर हैं. नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू, चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी और चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (राम विलास) भी जातीय जनगणना के पक्ष में है।

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने जातीय जनगणना के मुद्दे को लेकर बहुत गंभीर नहीं रही, उल्टा बिहार के जातिगत जनगणना पर तमाम सवाल भी उठाए।

 

भाजपा के सामने ये भी दुविधा
हाल के दिनों में कांग्रेस ने इस मुद्दे को बहुत अक्रामक तरीके से उठाया है।हालांकि इससे पहले कांग्रेस ने इस मुद्दे को कभी नहीं उठाया था। इस बार लोकसभा में कांग्रेस ने पहली बार इस मुद्दे को उठाया तो उसे इसका फायदा भी मिला है।

चुनाव परिणाम देखकर अब भाजपा को भी लगने लगा है कि इसपर सधी हुई चाल नहीं चली तो आगे भी नुकसान उठाना पड़ सकता है। भाजपा इस दुविधा में भी है कि जातिगत जनगणना के बाद नंबर के मुताबिक आरक्षण की मांग भी उठेगी। ऐसे में पार्टी के परंपरागत अगड़ी जातियों के वोटर भाजपा से नाराज न हो जाएं।
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