वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र भट्ट बताते हैं कि राज्यपाल को पत्र देकर मायावती को मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग करने के पीछे अमर सिंह थे, जो शुरू से ही राजपूत विधायकों की लामबंदी करके राजनीति में अपना महत्व बनाए रखने के माहिर थे। मायावती ने राज्यपाल से बर्खास्तगी की मांग करने वालों में शामिल भाजपा विधायक पूरण सिंह बुंदेला पर दबाव डालकर उन्हें अपने पाले में कर लिया। बुंदेला ने हजरतगंज कोतवाली में राजा भैया पर अपहरण और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए शिकायत की। पुलिस ने 2 नवंबर 2002 की रात में राजा भैया को गिरफ्तार कर लिया। मायावती के निर्देश पर राजा भैया के प्रतापगढ़ के भदरी रियासत स्थित आवास पर छापा पड़ा। वहां से कई हथियार बरामद किए गए। राजा भैया, उनके पिता उदय प्रताप और चचेरे भाई अक्षय प्रताप पर पोटा लगा दिया गया। राजा भैया के पिता के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व विश्व हिंदू परिषद से काफी अच्छे रिश्ते थे। इसी वजह से विनय कटियार ने पोटा हटाने और राजा उदय प्रताप को रिहा करने की मांग की थी। मायावती के इनकार करने पर रिश्ते बिगड़ते चले गए।
अमर सिंह ने अटल सरकार से लगाई गुहार
अमर सिंह ने दिल्ली में राजपूतों का बड़ा जमावड़ा कर मायावती सरकार के खिलाफ हमला बोला। साथ ही राजा भैया पर से पोटा हटाने के लिए केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर दबाव डाला। अमर सिंह का तर्क था कि पोटा का इस्तेमाल राजनीतिक कारणों से किया गया है।
मुलायम ने सरकार बनते ही हटा दिया पोटा
भाजपा के परदे के पीछे से दिए जा रहे समर्थन से मुलायम सिंह यादव ने 28 अगस्त 2003 को मुख्यमंत्री पद संभाला। सरकार बनने में जिन विधायकों के समर्थन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी उसमें राजा भैया के कई समर्थक थे। मुलायम जानते थे कि राजा भैया पर मायावती के गुस्से का कारण राज्यपाल से सरकार की बर्खास्तगी की मांग है, शायद इसीलिए मुलायम ने सरकार बनते और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के आधा घंटा के भीतर राजा भैया और उनके पिता व चचेरे भाई पर से पोटा हटाने का आदेश दे दिया। मुलायम सिंह ने उन्हें अपनी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाते हुए खाद्य-रसद विभाग सौंप दिया।
भाजपा सरकार के खिलाफ ही मुखर हो उठे संत
वर्ष 1999 में केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद भी अयोध्या में राममंदिर में हो रही देरी से संत और विहिप नेता काफी नाराज थे। वक्त 2002 विधानसभा चुनाव का था। मुख्यमंत्री थे राजनाथ सिंह। संतों और विहिप नेताओं ने मंदिर निर्माण पर भाजपा की चुप्पी पर नाराजगी व्यक्त करते हुए 90 दिन के श्रीराम नाम जप महायज्ञ और उसकी पूर्णाहुति पर 15 मार्च को शिलाएं अयोध्या ले जाने की घोषणा कर दी। केंद्र सरकार ने संतों को समझाया। पर, उन्होंने बात नहीं मानी। संतों व विहिप ने देशभर से रामसेवकों को अयोध्या आने का आह्वान किया। गुजरात से आए रामसेवक जब वापस जा रहे थे तो गोधरा कांड हो गया। इस कांड से गुजरात में दंगे भड़क उठे। इस घटनाक्रम का चुनाव में भाजपा पर प्रतिकूल असर पड़ा। चुनाव नतीजे आए तो किसी दल को बहुमत नहीं मिला। नतीजतन उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। सख्ती और बढ़ गई।
परमहंस व सिंघल ने सौंपीं दो शिलाएं : रामजन्मभूमि न्यास के तत्कालीन अध्यक्ष महंत रामचंद्रदास परमहंस नाराज हो गए। उन्होंने एलान किया कि 15 मार्च 2002 से यदि मंदिर का निर्माण शुरू नहीं हुआ तो वे विषपान कर जान दे देंगे। साथ ही अनशन पर बैठ गए। प्रधानमंत्री कार्यालय तक सतर्क हो गया। परमहंस को मनाने के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय से विशेष दूत के रूप में वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को अयोध्या भेजा गया। उन्होंने बातचीत कर मंदिर निर्माण के लिए प्रतीकात्मक तौर पर परमहंस और अशोक सिंघल से दो शिलाएं स्वीकार कर बीच का रास्ता निकाला।