रामजन्मभूमि के पुजारी आचार्य सत्येंद्र दास का यह भी आरोप है कि रामलला के सालाना आय-व्यय का कोई ब्योरा नहीं रखा जाता है। दान पात्र में श्रद्धालु, भक्त सोने, चांदी व नगदी चढ़ाते हैं लेकिन उसका भी कोई ब्योरा नहीं रहता है। बताया कि 1998 से 2002 तक आय-व्यय का ब्योरा रखा जाता था लेकिन उसके बाद का लेखा-जोखा उनके पास नहीं है। इस विषय में पूछने पर जिम्मेदार कुछ भी कहने से कतराते हैं।
कहा कि साल में जो आय व्यय होता है उसको सार्वजनिक किया जाना चाहिए। रामलला के दान-पात्र में सोने चांदी के जो सामान चढ़ता हैं, वह कहां जाते हैं इसका पता लगना चाहिए। वह भगवान की संपत्ति है, इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
पुजारी के आरोप सरासर गलत
मामले पर मंडलायुक्त/रिसीवर मनोज मिश्र का आरोप है कि दानपात्र की निगरानी 24 घंटे सीसीटीवी कैमरे से की जाती है। चार लोगों की एक कमेटी है, जिसकी निगरानी में दानपात्र खोला जाता है। जो नकद चढ़ावा आता उसे रामलला के खाते में जमा कराया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य चढ़ावा या सामान ट्रेजरी के लॉक में रखा जाता है। पूरी पारदर्शिता के साथ सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशन में रामलला परिसर की समस्त व्यवस्थाएं संचालित है। इसमें पुजारी का रोल सिर्फ पूजा-पाठ करना है। उनकी ओर से दिए गए बिल पर पिछले साल के स्वीकृत खर्च के अनुपात में बढ़ी महंगाई को देखते हुए इस साल बढ़ाकर स्वीकृति दी गई है। पुजारी का आरोप सरासर गलत है।