राष्ट्रीय लोकदल ने राकेश टिकैत को अमरोहा से प्रत्याशी बनाकर बड़ा दांव चला है।
17 साल बाद हुइ 'गठबंधन' को बहुत खास माना जा रहा है। भाकियू के संस्थापक स्वर्गीय चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत राजनीति से दूर रहे। एक जमाने में उनके मंच पर किसी राजनीतिज्ञ की एंट्री नहीं होती थी।
यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी को सियासी होने के कारण उनके मंच पर जाने से रोक दिया गया था।
सिर्फ तीन मौके आए जब उन्होंने राजनीतिक पहल की। पहली बार 1991 में उन्होंने राम के नाम पर वोट देने की अपील की।
उस समय किसान आंदोलन शबाब पर था। भाजपा को इस चुनाव में पश्चिमी यूपी में शानदार जीत मिली।
और इस तरह हुईं दोनों की जुदा राहें
राजनीतिक दलों से मायूस टिकैत ने 1996 में अजित सिंह को आगे बढ़ाकर दूसरा सियासी प्रयोग भारतीय किसान कामगार पार्टी बनवाकर किया।
भाकिकापा अकेले विधानसभा चुनाव में कूदी और आठ सीटें मिली। हालांकि अपेक्षित कामयाबी न मिलने पर कुछ समय बाद ही दोनों की राहें जुदा हो गईं।
तीसरी बार निजी तौर पर टिकैत की असहमति के बावजूद भाकियू ने अपनी राजनीतिक विंग के तौर पर भारतीय किसान पार्टी बनाई।
हालांकि इसे कुछ समय बाद भंग कर दिया गया। कई ऐसे मौके आए जब टिकैत और अजित सिंह आमने-सामने दिखाई पड़े।
हालांकि जब टिकैत संकट में रहे तो अजित सिंह किसान स्वाभिमान के नाम पर उनके साथ खड़े भी हुए।
यूं बढ़ीं नजदीकियां
राजनीतिक तौर पर जुदा होते हुए भी किसान नेता के तौर पर रालोद नेता भी टिकैत का सम्मान करते थे।
मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जयंत चौधरी गांवों के दौरे पर निकले, तो सिसौली में भाकियू अध्यक्ष चौधरी नरेश टिकैत के पास पहुंच गए।
नरेश बालियान खाप के मुखिया भी हैं। वहीं से दोनों परिवारों के बीच नजदीकियां बढ़ीं।
पड़ेगा गहरा असर
केंद्रीय सेवाओं में जाटों को आरक्षण मिलने पर राकेश टिकैत अजित सिंह को बधाई देने गए।
दोनों तरफ से हाथ बढ़े और शुक्रवार सुबह राकेश टिकैत ने रालोद की सदस्यता ग्रहण की। इसके तत्काल बाद उन्हें अमरोहा से प्रत्याशी बना दिया गया।
इस एका से रालोद को पश्चिमी यूपी के कई जिलों के समीकरणों पर असर पड़ने की उम्मीद है। रालोद को जाटों के साथ ही किसानों की एकजुटता का संदेश जाएगा।