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पांच साल में भारत में तैयार हो जाएगा क्वांटम कंप्यूटर : डॉ. विजय पांडुरंग भाटकर

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पद्मभूषण डॉ. विजय पांडुरंग भाटकर
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लखनऊ। सुपर कंप्यूटर से भी कई हजार गुना ज्यादा क्षमतावान क्वांटम कंप्यूटर अब भारत का अगला पड़ाव है। अगले पांच साल में यह तैयार हो जाएगा। यह कहना है भारत में सुपर कंप्यूटर के जनक कहे जाने वाले पद्मभूषण डॉ. विजय पांडुरंग भाटकर का।
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डॉ. विजय पांडुरंग, सोमवार को होने वाले लखनऊ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर लखनऊ आए हैं। दीक्षांत समारोह की पूर्व संध्या पर उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए बताया कि भारत क्वांटम कंप्यूटर की तैयारी में लगा है। बोले, सुपर कंप्यूटर और क्वांटम कंप्यूटर का उपयोग हर क्षेत्र में हो सकता है। मौसम, रक्षा, स्पेस और यहां तक कि आधुनिक कार से लेकर कई क्षेत्रों में इनका काफी उपयोग होगा।

एआई की चुनौतियों के लिए रहना होगा तैयार
डॉ. भाटकर के मुताबिक, विज्ञान आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के रूप में तरक्की करता जा रहा है। इसके साथ ही नई बहस छिड़ गई है कि एआई मानव जाति के लिए संकट न खड़ा करने लगे। इससे नौकरियां जाने का खतरा है। ऐसी स्थिति में हमें इस पर विचार करना चाहिए कि किस सीमा के बाद एआई के उपयोग पर पाबंदी लगे।
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अमेरिका ने नहीं दिया तो तैयार कर लिया अपना सुपर कंप्यूटर

डॉ. विजय पांडुरंग ने बताया कि देश में फसल का अच्छा होना और न होना मौसम और बारिश पर निर्भर है। सुपर कंप्यूटर से मौसम का सटीक आकलन संभव है, लेकिन वर्ष 1991 से पहले सिर्फ अमेरिका के पास ही यह तकनीक थी।भारत ने मौसम के आकलन के लिए अमेरिका से सुपर कंप्यूटर मांगा, लेकिन उसने साफ मना दिया। ऐसे में हमने महज तीन साल में खुद का सुपर कंप्यूटर तैयार कर लिया।

पुरानी यादें साझा करते हुए डॉ. भाटकर ने बताया कि उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी बेहद निराश थे, जब उनको अमेरिका से सुपर कंप्यूटर न मिलने की बात पता चली। अमेरिका अपनी पुरानी तकनीक भी इस शर्त पर देने के लिए तैयार हुआ कि सुपर कंप्यूटर सेंटर पर उनकी टीम निगरानी करेगी और इसका उपयोग सिर्फ मौसम की जानकारी के लिए ही किया जाएगा। ऐसे में राजीव गांधी ने बैठक में यह सवाल उठाया कि क्या हम अपना सुपर कंप्यूटर नहीं तैयार कर सकते।

डॉ. भाटकर के मुताबिक, उन्होंने इसके लिए हामी भरी और अगले तीन साल में इसे विकसित करने का लक्ष्य रखा। सुपर कंप्यूटर के लिए अलग सेंटर स्थापित किया गया और सौ लोगों की टीम ने तीन साल के समय में महज 37 करोड़ रुपये की लागत में पूरी तकनीक विकसित कर दी। इसके बाद यह तकनीक कई अन्य देशों को भी दी गई।
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