ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रचने वाली शटलर पीवी सिंधू जब देश की उम्मीदों को साकार करने के लिए रियो में जूझ रही थीं, पूरा लखनऊ उनकी जीत की दुआ कर रहा था। आखिर हो भी क्यों न? 120 साल के ओलंपिक इतिहास में सिल्वर पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं 21 साल की सिंधू की जीत की राह लखनऊ की सरजमीं से जो खुली थी।
सिंधू ने यहीं पर जूझना सीखा था। कभी हार न मानना यहीं सीखा। जीतने का जज्बा भी इसी धरती पर भरा। यह और बात है कि वे स्वर्ण की लड़ाई नहीं जीत सकीं पर हारने से पहले वह खूब लड़ीं और सबका दिल जीत लिया।
रियो में कामयाबी की इबारत लिखने वाली सिंधू को लखनऊ की धरती कुछ ज्यादा ही रास आती है। यहां पर उन्होंने सैयद मोदी बैडमिंटन ग्रां प्री चैम्पियनशिप जीती तो जूनियर बैडमिंटन का ब्रांज मेडल भी यहीं पर जीता। गोमतीनगर स्थित यूपी बैडमिंटन अकादमी में उनकी चपलता व स्फूर्ति देखकर हर कोई हैरान रह जाता था।
सिंधू खुद कहती है कि यहां खेलकर उनका आत्मविश्वास दोगुना हो जाता है। राजधानी के प्रशंसकों को उनका बहुत क्रेज था। उन्हें प्रैक्टिस करते देखने और मिलने के लिए काफी भीड़ जुटती थी।