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वॉट एन आइडिया, 1500 में ट्वायलेट

Sun, 10 Nov 2013 01:44 AM IST
अतुल भारद्वाज/लखनऊ
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विनायकपुरम् निवासी राघव मौर्या के लिए घर में शौचालय नहीं होने से समस्या बनी हुई थी। इसके चलते उन्हें खुले में जाना पड़ता था।
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फिर एक दिन पानी की समस्याओं पर काम कर रही संस्था से जानकारी मिली कि पेट की बीमारियों के पीछे प्रमुख वजह उनके पीने का पानी का प्रदूषित होना है।

अब यह समस्या सिर्फ 1500 रुपये की कीमत से बने टॉयलेट से दूर हो चुकी है। स्थानीय एनजीओ विज्ञान फाउंडेशन के कार्यकर्ताओं ने खुले में शौच की समस्या का हल 1500 रुपये में टॉयलेट का फॉर्मूला इजाद कर निकाला है।

अब तक बनाए 1129 लो-कॉस्ट टॉयलेट
विज्ञान का उपयोग कर कम कीमत में बनी इस तकनीक को दूसरी जगहों पर आजमाने की तैयारी अंतरराष्ट्रीय संस्था वाटर-एड कर रही है। चार साल पहले कम विकसित इलाकों में पेट की बीमारियों के लिए जिम्मेदार ई-कोली बैक्टीरिया के मिलने के बाद शुरू हुई इस मुहिम में अब तक 1129 लो-कॉस्ट टॉयलेट बनवाए गए हैं।
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हर साल 10 नवंबर को मनाए जाने वाले विश्व विज्ञान दिवस पर 2013 में पानी के लिए लिए लोगों को जागरूक करने और विज्ञान की मदद से सहयोग और नए प्रयोग बढ़ाने की थीम संयुक्त राष्ट्र ने चुनी है।

अंतरराष्ट्रीय संस्था वाटर-एड के साथ शुरू किए वाटर सेनिटेशन अभियान में टॉयलेट की जरूरत बताई गई। इसके बाद एनजीओ के कार्यकर्ताओं ने स्थानीय जरूरतों और आर्थिक दिक्कतों के बीच विज्ञान की मदद से ही रास्ता निकाला।
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टॉयलेट के लिए जहां सोकपिट गड्ढों का इस्तेमाल हुआ। वहीं, दीवार से लेकर छत बनाने तक के लिए चूना और जूट के पुराने बोरे व बांस की खपच्ची चुनी गईं।

टॉयलेट सीट लगने के बाद शेड बनाने के लिए चार बांस लगाकर पुराने जूट के बोरों की दीवार और छत बनाई गई। इन बोरों को पहले चूने में भिगोया गया। चारों ओर लपेटने के बाद सूखने पर यह काफी सख्त हो गया।

इससे जरूरी आड़ और मजबूती दोनों बिना कुछ खर्च किए मिल गए। 37.5 घनमी जगह में बने पूरे टॉयलेट में केवल 1500 रुपये का खर्च आया।
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