एनडीए के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद व शिवपाल यादव
- फोटो : amar ujala
राष्ट्रपति चुनाव के साथ प्रदेश में सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। भाजपा रणनीतिकार वोट बढ़ाने और विपक्ष अपने वोट बचाने की उधेड़बुन में जुटा है। भले ही विपक्ष की तरफ से पूरी तरह एकजुट होने का दावा किया जा रहा हो लेकिन राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह साफ हो चुका है कि यह चुनाव प्रदेश में नए सियासी समीकरण की नींव रखने जा रहा है। इसके नतीजे निकट भविष्य में प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों को प्रभावित करेंगे।
राष्ट्रपति चुनाव में पड़ने वाले वोटों से यह पता चल जाएगा कि भविष्य में प्रदेश की राजनीति की दिशा किधर होगी? सपा में जारी घमासान कहां तक जाएगा? भाजपा का विकल्प खड़ा करने की कोशिशें कितना सफल होंगी?
इन सवालों का जवाब नतीजा सामने आने के बाद मिलेगा। पर, कौन सियासी सूरमा किधर करवट लेने वाला है। इसका संकेत सोमवार को मतदान वाले दिन ही मिल जाएगा।
वजह, सियासी गलियारों में यह चर्चाएं काफी तेज हैं कि प्रदेश के कई सियासी चेहरे भविष्य के सुरक्षित ठौर की तलाश इस चुनाव के बहाने पूरी कर लेना चाहते हैं।
शिवपाल के रुख से दिख रही संभावनाएं
शिवपाल सिंह यादव
सपा नेता शिवपाल यादव की राजग उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के पक्ष में मतदान की घोषणा और अन्य विधायकों से भी ऐसा करने की उनकी अपील ने राष्ट्रपति चुनाव के बाद प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरणों की संभावना को और प्रबल बना दिया है।
पिछले दिनों सेकुलर मोर्चा बनाने की घोषणा कर चुके शिवपाल के ताजा बयान से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि भतीजे अखिलेश यादव से उनकी तनातनी फिलहाल थमने वाली नहीं है।
पार्टी में हाशिए पर डाले जाने से नाराज शिवपाल इस चुनाव के बहाने और बाद में अखिलेश को अपनी ताकत का एहसास कराने की पृष्ठभूमि तैयार करेंगे।
वह भविष्य में भाजपा के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन से इस तरह की परिस्थितियां बनाने की कोशिश करेंगे जिससे अखिलेश के राजनीतिक भविष्य की चुनौती बढ़ जाए।
इसलिए हो रही है चर्चा
जाहिर है, शिवपाल यादव यह काम भाजपा की मदद से ज्यादा अच्छे से कर पाएंगे। कयास लगाए जा रहे हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा भी शिवपाल के जरिये पिछड़ों में बड़े वोट बैंक यादवों में सेंधमारी की कोशिश करेगी।
साथ ही भाजपा विरोधी किसी गठबंधन की नींव को भी कमजोर करने का प्रयास करेगी। हालांकि इसका स्वरूप क्या होगा, इस बारे में भाजपा के स्थानीय नेताओं को बहुत ज्यादा मालूम नहीं है लेकिन निजी बातचीत में इनका यह जरूर कहना है कि भविष्य में विपक्ष के गठबंधन को देखते हुए पार्टी रणनीतिकार चुनावी संघर्ष को 80 बनाम 20 बनाना चाहते हैं।
इसके लिए प्रदेश की 54 प्रतिशत आबादी में लगभग 20 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले यादवों के वोट भी चाहिए ही होंगे।
अखिलेश-शिवपाल सुलह की संभावनाएं दूर-दूर तक नहीं
अखिलेश यादव व शिवपाल यादव
- फोटो : amar ujala
राजनीतिक समीक्षकों का भी मानना है कि सपा का घमासान जिस मुकाम पर पहुंच चुका है उसे देखते हुए फिलहाल शिवपाल और अखिलेश के बीच सुलह की संभावनाएं दूर तक दिखाई नहीं देती। शिवपाल के सामने न सिर्फ अपना वजूद बल्कि पुत्र आदित्य यादव के राजनीतिक भविष्य का भी सवाल है।
यह मौजूदा हालात को देखते हुए सपा में संभव नहीं लग रहा है। इसलिए संभावना यही है कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद शिवपाल बनाम अखिलेश का संघर्ष बढ़ेगा। अटकलें यह भी हैं कि शिवपाल व सपा के कुछ विधायकों के अलावा बसपा और कांग्रेस के पांच विधायक भी भाजपा के संपर्क में हैं। निर्दलीय विधायकों में तीन के भाजपा के पक्ष में जाने की चर्चा है।
कहा जा रहा है कि ये लगातार भाजपा नेतृत्व के संपर्क में हैं। भाजपा नेतृत्व इनके जरिये विरोधियों पर हमला कराकर यह संदेश देना चाहता है कि उसका विरोध करने वालों की नीतियों से उन्हीं के लोग कितना क्षुब्ध हैं।