प्रदेश के नगर निकाय चुनाव में समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन कमजोर रहा। इसकी बड़ी वजह सपा की लचर रणनीति और प्रत्याशी चयन में देरी रही। चुनाव में एक तरफ प्रत्याशी की घोषणा हो रही थी तो दूसरी तरफ जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष घोषित किए गए, यह भी हार की बड़ी वजह रही। फिलहाल पार्टी का दावा है कि वह लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी है।
समाजवादी पार्टी नगर निकाय चुनाव में उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई है। पार्टी को उम्मीद है कि महापौर पर खाता खोलने में सफल रहेंगे, लेकिन इस उम्मीद पर पानी फिर गया। इसी तरह नगर पालिका परिषद के साथ नगर पंचायत अध्यक्षों की संख्या भी बढ़ने की उम्मीद थी। इसमें भी पार्टी गच्चा खा गई है। प्रदेश की सियासी नब्ज पर नजर रखने वालों का कहना है कि जिस गति से महंगाई, बेरोजगारी सहित अन्य जनहित के मुद्दों पर सपा को सक्रियता दिखानी चाहिए थी, वह नहीं कर पाई।
कई जगह पार्टी के उम्मीदवार आपस में ही भिडते रहे। एक जगह दो से तीन उम्मीदवार मैदान में होने का भी नुकसान उठाना पड़ा है। प्रदेश में पिछली बार नगर निगम में सपा के 202 पार्षद थे। इस तरह कुल पार्षद का 15.54 फीसदी सपा के थे। इस बार यह आंकड़ा 13.45 फीसदी तक ही पहुंच पाया है। इसी तरह नगर पालिका परिषद अध्यक्ष 45 थे यानी 22.73 फीसदी थे, जो इस बार यह संख्या घटकर 35 यानी 17.59 फीसदी पर पहुंच गई, नगर पालिका सदस्यों की संख्या 488 यानी 9.07 फीसदी थे, जो इस बार 420 यानी 7.88 फीसदी पर सिमट गए।
इसी तरह नगर पंचायत अध्यक्ष 83 यानी 18.95 फीसदी की जगह इस चुनाव में संख्या घटकर 78 यानी 14.34 फीसदी हो गई। नगर पंचायत सदस्यों की संख्या 453 यानी 8.34 फीसदी से घटकर 483 यानी 6.73 फीसदी पर पहुंच गई। इस तरह देखा जाए तो सपा को हर सीट पर नुकसान उठाना पड़ा है।
दोहराई विधानसभा चुनाव वाली गलती
समाजवादी पार्टी ने विधानसभा चुनाव के दौरान जो गलती की थी, वही गलती नगर निकाय चुनाव में भी की। पार्टी नामांकन के अंतिम दिन तक प्रत्याशी घोषित करती रही। जहां पहले प्रत्याश घोषित किया था, वहां बदलते रहे। कई जिलों में नगर निकाय चुनाव को लेकर पार्टी विधायकों के बीच भी खींचतान रही। यही वजह रही कि पार्टी को ऐन मौके पर निर्दल उम्मीदवारों पर दांव लगाना पड़ा, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया। निर्दल उम्मीदवार सियासी मैदान में पस्त नजर आए।
चुनाव प्रचार में भी नहीं दिखाई रुचि
समाजवादी पार्टी नगर निकाय चुनाव प्रचार में भी रूचि नहीं दिखाई। यहां तक की सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव चुनाव के ठीक पहले मैदान में उतरे। उन्होंने गोरखपुर से चुनाव प्रचार की शुरुआत की। इसके बाद लखनऊ में मेट्रो से यात्रा की। फिर वह मेरठ, अलीगढ़ में ताकत लगाएं। कानपुर सीट मुफीद लगी तो यहां डिंपल यादव के बाद अखिलेश यादव ने भी रोड शो किया। लेकिन चुनाव परिणाम पक्ष में नहीं आए।
बसपा का मुस्लिम दांव, सपा के लिए नुकसानदेह
बहुजन समाज पार्टी ने कई सीटों पर मुस्लिम दांव चला, जबकि सपा इससे बचती नजर आई। इसकी वजह से भी सपा के कोर वोटबैंक माने जाने वाले मुसलमानों में एकजुटता का अभाव दिखा। इसका सीधा फायदा भाजपा को मिला।