वायु प्रदूषण का खतरा (AI)
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तालकटोरा क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों को अलग-अलग समय पर चलाने के डीएम सूर्यपाल गंगवार के निर्देश पर उद्यमियों ने सवाल उठाए हैं। उद्यमियों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अकेले औद्योगिक इकाइयां ही क्या शहर में प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं? इकाइयों पर ऐसे फैसले थोपने की क्यों कोशिश हो रही है।
हवा में घुलते जहर को कम करने के लिए जिलाधिकारी ने तालकटोरा औद्योगिक क्षेत्र में अगले 15 दिन तक अलग-अलग समय पर इकाइयों को चलाने के निर्देश दिए हैं। यही नहीं, 15 दिन के ट्रायल के बाद सुधार मिले तो प्रक्रिया को तीन महीने तक चलाने को कहा है। इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन लखनऊ चैप्टर व तालकटोरा इंडस्ट्रियल एसोसिएशन ने इन निर्देशों को अव्यावहारिक बताया है।
बैठक में आईआईए के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल रहे कार्यकारी निदेशक श्री प्रकाश आचार्य ने बताया कि डीएम ने सभी विभागों से तालमेल बनाकर निर्देशों को लागू कराने को कहा है। आचार्य का कहना है कि वह औद्योगिक इकाइयों को शिड्यूलिंग के लिए कहेंगे।
उद्यमियों के सवाल और दलीलें
शहर में प्रदूषण दिवाली के बाद बढ़ा है। फैक्ट्रियां तो पहले से भी चल रही थीं। दिवाली की छुट्टी में इकाइयां बंद थीं, तो फिर वायु प्रदूषण बढ़ाने में फैक्ट्रियां ही अकेले कैसे जिम्मेदार?
उद्यमियों का तर्क है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वायु गुणवत्ता सूचकांक मापने के लिए जो यंत्र लगाया है वह पांच किमी की परिधि तक का हाल बताता है। चारबाग स्टेशन, आलमबाग, ऐशबाग, चौक जैसे क्षेत्र इस परिधि में ही आ जाते हैं। इन इलाकों में वाहनों का काफी दबाव रहता है और जाम भी लगता है। सबसे ज्यादा प्रदूषण जाम में लंबे समय तक फंसे वाहन फैलाते हैं।
तालकटोरा औद्योगिक क्षेत्र की बदहाल सड़कों से दिन भर धूल उड़ती है। वर्षों से नाला और सड़क बन ही रही हैं। इस धूल उड़ने के लिए इंडस्ट्री कैसे जिम्मेदार है?
मैंने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को पत्र लिखकर बताया है कि तालकटोरा में लगा यंत्र 5 किमी की परिधि में आने वाले इलाकों को कवर करता है। यानी पूरे क्षेत्र का प्रदूषण तालकटोरा में लगा मापक यंत्र बताता है। वर्षों से सड़कों व नालों का निर्माण चल रहा है, इससे धूल उड़ती है। ऐसे में तालकटोरा की औद्योगिक इकाइयों को क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। ये कहां का न्याय है?-विकास खन्ना, चेयरमैन, आईआईए, लखनऊ चैप्टर
चलती इकाइयों से छेड़छाड़ अव्यावहारिक
इंडस्ट्री को अलग-अलग समय पर चलाने की बात पूरी तरह से अव्यावहारिक है। दिन में जो श्रमिक काम के लिए आते हैं, वे रात में क्यों आएंगे? 1000 रुपये लेने वाले 1400 रुपये लेंगे। श्रमिक रात में काम करेंगे तो उत्पादन भी घटेगा। इंडस्ट्री तो दिवाली से पहले भी चल रही थी। चलते सिस्टम से छेड़छाड़ के बजाय प्रशासन को वाहनों पर अंकुश लगाने समेत अन्य उपायों पर गौर करना चाहिए।- संदीप सक्सेना, चेयरमैन, आईटी एंड एग्रीकल्चर सेल, एसोचैम