डॉ. भीमराव अंबेडकर की अगले सप्ताह जयंती को लेकर सूबे के सभी सियासी दल सक्रिय हो गए हैं। भाजपा, सपा, बसपा व कांग्रेस में कोई भी दल इस मुद्दे पर पीछे दिखना नहीं चाहता। बसपा दलित महापुरुषों पर अपना पेटेंट ही मानती है। इसलिए उसकी तो बात ही अलग है।
पर, पिछड़ों की राजनीति करने वाली सपा भी यह साबित करने में जुट गई है कि अंबेडकर सिर्फ बसपा के नहीं है। उसे भी अंबेडकर से प्रेम है। भाजपा व संघ परिवार की भी हमेशा से दलित वोटों पर नजर रही है। इस बार चूंकि केंद्र में सरकार है तो कोशिश भी खास है।
संगठन स्तर पर अंबेडकर की तस्वीर कार्यक्रमों का अहम हिस्सा पहले ही बन चुकी है। अब केंद्र सरकार की तरफ से भी कई योजनाएं व कार्यक्रम घोषित होने वाले हैं। लोकसभा में 50 से कम सीटों पर सिमट चुकी कांग्रेस भी किसी को यह कहने का मौका नहीं देना चाहती कि अंबेडकर उसके एजेंडे में नहीं हैं। इसलिए वह भी कई कार्यक्रम करेगी।
सियासत जाति के सहारे ही चलती है
राजनीतिक समीक्षकों का कहना है कि भले ही कोर्ट ने सूबे में जातीय राजनीति पर अंकुश लगाने के लिए जातीय सम्मेलनों पर रोक लगा दी है लेकिन यहां सियासत जाति के सहारे ही चलती है। कोई खुलकर इसका इस्तेमाल करता है तो कोई परदे के पीछे से। हर दल की कोशिश जातीय गणित ठीक करके वोटों का समीकरण सुधारने पर रहती है।
अंबेडकर को लेकर सियासी दलों में उमड़े प्रेम के पीछे 2017 का चुनावी समर है। सभी की नजर सूबे के 22 प्रतिशत दलित वोटों पर टिकी है। दलितों की बात हो तो डॉ. अंबेडकर से बेहतर कोई और हो नहीं सकता। इसलिए सभी के मुंह से अंबेडकर प्रेम छलकने लगा है।
सभी दल उन्हें अपना साबित करने में जुटे हैं। वैसे तो अंबेडकर जंयती हर साल आती है लेकिन इस वर्ष 125वीं जयंती होने के नाते सभी दलों के पास अंबेडकर को अपना बताने और इस बहाने दलितों को रिझाने का सुनहरा मौका है।
इसीलिए अपने-अपने तरीके से सियासी गोटियां बिछाने की तैयारी चल रही है। जहां तक भाजपा का सवाल है तो उसे ऐसे आयोजनों से कुछ महीनों बाद बिहार में होने वाले चुनाव में लाभ मिलने की उम्मीद दिख रही है। इसलिए उसकी कोशिश इस मुद्दे पर सभी को पीछे छोड़ने की है।
सभी दल इस तरह कर रहे तैयारी
सपा सरकार ने जिलों को धन जारी करके सरकारी स्तर पर अच्छी तरह से कार्यक्रम करने का निर्देश दिया है तो संगठन स्तर पर भी कुछ न कुछ करने की चर्चा है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ ने पूरे साल कोई न कोई कार्यक्रम करने की योजना बनाई है।
इसे वोटों का गणित ही कहा जाएगा जो बसपा सुप्रीमो मायावती अंबेडकर जयंती पर लखनऊ में रहेंगी और लंबे अरसे बाद श्रद्धांजलि समारोह में शामिल होंगी। भाजपा भी पूरे देश में राजनीतिक नजरिए से वोटों की गोटें सजाना चाहती है।
इसलिए संगठन स्तर पर जहां दलितों के घर जाने और उन्हें भाजपा के बारे में बताने व अंबेडकर जंयती पर जगह-जगह कार्यक्रम करने की योजना है, वहीं सामाजिक समरसता सम्मेलन करने का फैसला भी हुआ है।
दलितों व पिछड़ों की बात हो भाजपा सामाजिक न्याय समिति की रिपोर्ट का उल्लेख करना नहीं भूलती। उसने इस बारे में दलितों को बताने व समझाने का फैसला किया है।
भाजपा के एजेंडे में हैं कई काम
भाजपा के रणनीतिकार मानते हैं कि प्रदेश की 80 संसदीय सीटों में से गठबंधन सहित 73 पर जीत और सुरक्षित सीटों में सभी 17 का भाजपा की झोली में आना दलितों के समर्थन से ही संभव हो सका है। इसीलिए वह दलितों को जोड़े रखने के एजेंडे पर अंबेडकर जयंती से काम शुरू करने की तैयारी में है।
भाजपा अनुसूचित मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष दिवाकर सेठ बताते हैं कि 14 अप्रैल को सभी जिलों में कार्यक्रम होंगे। इसके बाद ‘समरसता सप्ताह’ मनेगा। भाजपाई दलित बस्तियों में जाकर सामूहिक भोज करेंगे और भाजपा की दलित हितैषी छवि से परिचित कराएंगे।
यह भी बताएंगे कि खुद को अंबेडकर की विरासत का उत्तराधिकारी बताने वाले बसपा जैसे दलों ने कुछ भी नहीं किया। अंबेडकर की जन्मभूमि महू (मध्यप्रदेश) हो या उनकी दीक्षा भूमि नागपुर, उनका दिल्ली में निवास स्थान 26 अलीपुर रोड की कोठी हो या मुंबई के जुहू स्थित अंत्येष्टि स्थल चैतभूमि, इन सभी का विकास सिर्फ भाजपा ने ही किया है।
मोदी सरकार करेगी कुछ बड़ी घोषणाएं
बताया जाएगा कि भाजपा बहुत पहले से अंबेडकर का सम्मान करती रही है। अंबेडकर के अलीपुर रोड स्थित कोठी को संबंधित भवनस्वामी से खरीदकर उसे अंबेडकर संग्रहालय बनवाने का काम भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने ही शुरू किया था जो आज भी जारी है।
मोदी सरकार कुछ और कार्यक्रमों व योजनाओं की घोषणा कर सकती है। कुछ योजनाएं दलितों के लिए आर्थिक मदद से भी जुड़ी होंगी। अलीपुर रोड स्थित कोठी को अंबेडकर स्मारक घोषित करने का फैसला किया गया है।
गोरखपुर विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. एसपीएन त्रिपाठी कहते हैं कि दुर्भाग्य से सूबे में ही नहीं देश के ज्यादातर प्रांतों में वोट डालने का फैसला विकास व पिछड़ेपन पर कम जाति व बिरादरी के आधार पर ज्यादा होता है।
दलों को यह बुराई खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए। लेकिन वोटों की खातिर वे ऐसा नहीं कर पाते। इसीलिए कभी अंबेडकर तो कभी कोई और राजनीतिक दलों के एजेंडे में सज जाता है। सवाल यूपी के दलित वोटों का है तो अंबेडकर से लेकर जगजीवन राम तक की सभी को याद आ रही है।