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किसानों की मौतों के बीच जारी सियासी खेल

Tue, 07 Apr 2015 01:49 AM IST
महेंद्र तिवारी/अमर उजाला, लखनऊ
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मार्च और अप्रैल में बारिश और ओले...। पिछले डेढ़ महीने में बारिश-ओले और आंधी से फसलों की जैसी बर्बादी हुई, हाल के बरसों में कभी हुई हो, याद नहीं आता। किसान टूट गए...। बिखर गए...। बच्चों की पढ़ाई, बेटी का ब्याह और कर्ज अदायगी की चिंता...। जो दिल को संभाल न सके...सदमे से उनकी मौत हो गई। ...तो कई खुदकुशी तक कर बैठे।
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सरकार ने राहत के बड़े-बड़े दावे किए। पर... रोजाना हो रही किसानों की मौतें उसके दावों पर सवाल खड़े कर रही हैं। सबका पेट भरने वाले अन्नदाता अपने परिवार का पेट भरने की चिंता में पड़े हैं।...तो दूसरी ओर किसानों की बर्बादी पर सियासी फसलें लहलहाने की होड़ मची है।

कृषि विज्ञान केंद्र सुल्तानपुर के डॉ. एके सिंह बताते हैं कि जब फूल आ रहे थे और जब फसलें तैयार होने को आईं, दोनों ही मौकों पर बारिश, ओले व अंधड़ की मार पड़ी। मौसम की एक के बाद एक मार ने न फसलों को संभलने का मौका दिया और न किसान को।
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ओले गिरने से कई जिलों में तो फसलों का बड़ा हिस्सा खेतों से उठाने लायक नहीं बचा। हालात ये हैं कि गेहूं की फसल 50-60 फीसदी तक खराब हो गई। इसमें पश्चिमी यूपी में ज्यादा बर्बादी हुई। दलहन और तिलहन की फसल भी 40-60 फीसदी तक बर्बाद हो गई। फसलों की बर्बादी ने किसानों को एक साथ कई मुसीबत में फंसा दिया है।

आत्महत्या, हार्टअटैक से 100 से ज्यादा मौतें

खेती के लिए लिए गए कर्ज को चुकाने की चिंता, परिवार का साल भर पेट भरने की चिंता, बच्चों को पढ़ाने की चिंता और बेटी की शादी की चिंता में किसानों को नहीं सूझ रहा है कि  वे आगे क्या करें? लिहाजा कई मौत का रास्ता चुन रहे हैं तो कई बेहाली से जूझ रहे किसानों को खुद मौत अपने शिकंजे में दबोच रही है।

सूबे में आत्महत्या, सदमे के चलते हार्टअटैक से मार्च से अप्रैल के बीच 100 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। सरकार ने 25 मार्च के पहले ऐसी मौतों की सूचना की पड़ताल कराई तो जिलाधिकारियों ने 90 की रिपोर्ट भेजी। कई मामलों में  मौत का कारण मानसिक उलझन व हार्टअटैक बताया गया।

फसलों की बर्बादी से मौत को गले लगाने  की बात न सरकार ने मानी और उनकी मशीनरी ने। बमुश्किल सरकार ने माना कि सूबे में 22 किसानों की मौत हुई है लेकिन वह भी दैवीय आपदा से। इन्हें ही मदद देने की कार्यवाही चल रही है।

दिनों दिन बढ़ता जा रहा नुकसान
सरकार ने 25 मार्च के पहले बारिश और ओले गिरने के कारण सूबे के 31 जिलों में 744.48 करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान लगाया। केंद्र को इसी नुकसान की जानकारी देकर मदद मांगी गई है। पर, बारिश और ओलों का कहर अब भी जारी है।  प्रदेश में गेहूं को नुकसान करीब 50-60 फीसदी, दलहन और तिलहन को क्रमश: 40-60 फीसदी तक पहुंच गया। पश्चिमी यूपी में ज्यादा नुकसान हुआ है।

सरकार ने मदद के लिए दिल तो खोला....

राज्य सरकार ने हालांकि फसलों की बर्बादी पर केंद्र से मिलने वाला मुआवजा दोगुना किया। केंद्र सरकार के मानक के अनुसार सिंचित फसलों के नुकसान पर 9000 रुपये प्रति हेक्टेयर, असिंचित पर 4500 रुपये प्रति हेक्टेयर और बारहमासी फसलों के लिए 12 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से मदद मिलती है।

राज्य सरकार ने इसे बढ़ाकर क्रमश: 18 हजार, 9 हजार  व 24 हजार रुपये कर दिया। इसके अलावा चक्रवाती तूफान से मौत पर पीड़ित परिवारों को मिलने वाली मदद की रकम 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर सात लाख रुपये कर दी है। इसमें 3.5 लाख रुपये सरकार के खजाने से और दो लाख रुपये सीएम आपदा राहत फंड से देने का ऐलान किया गया। पर, ज्यादातर किसानों को अभी यह मदद नहीं पहुंच पाई।

पर किसान तक नहीं पहुंच पा रही मदद
इसे खुद सरकारी आंकडे़ ही साबित करते हैं। प्रदेश सरकार ने 744 करोड़ रुपये के नुकसान का फौरी अनुमान लगाते हुए पहली किस्त में 44.74 करोड़ और दूसरी किस्त में राज्य आकस्मिकता निधि से 200 करोड़ रुपये जारी किए। सरकार ने यह रकम जिलाधिकारियों को जारी करते हुए हिदायत दी थी कि इसे हर हाल में 31 मार्च तक खर्च कर दिया जाए। पर, सरकार को  3 अप्रैल तक मिली जानकारी के अनुसार इस रकम में से भी सिर्फ 90.66 करोड़ रुपये की सहायता ही बांटी जा सकी थी।

आखिर क्यों होता है ये खेल

बर्बादी पर खुदकुशी को बता दिया जाता है पारिवारिक कलह का नतीजा
किसानों की आत्महत्या को स्वीकार करने में सरकार का एक पुराना शासनादेश ही मुसीबत बना हुआ है। जानकार बताते हैं कि किसान की आत्महत्या चूंकि सत्ताधारी दल की बदनामी की वजह बनती है और आत्महत्या साबित होने पर जिम्मेदारों को जेल तक हो सकती है, लिहाजा सरकार ने एक शासनादेश जारी कर किसान की आत्महत्या या भूख से मौतों की जिम्मेदारी सीधे जिलाधिकारी पर डाल दी।

यह शासनादेश तो इस उम्मीद में जारी हुआ था कि जिलाधिकारी ऐसे मामलों में इतने संवेदनशील होंगे कि ऐसी नौबत ही नहीं आएगी। पर, कौन अपनी गर्दन फंसाए। लिहाजा जिलाधिकारियों के स्तर से आत्महत्या, फसलों की बर्बादी और भूख से मौतों को झुठलाने के लिए तरह-तरह के कारण गिनाए जाने लगे।

मसलन, आत्महत्या वाले दिन किसान के घर खाना बना था। आटा और चावल भी था। परिवार में कमाई वाले सदस्य भी थे। खेती भी है और नुकसान इतना नहीं हुआ कि उससे किसान मौत को मुंह लगा लें। कई मामलों में पारिवारिक कलह तक बता दी जाती है।

संवेदनशील सरकार यह कर सकती है

नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय कुमारगंज फैजाबाद के अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्र मऊ के डॉ. सौरभ वर्मा कहते हैं कि सरकार को खेती-किसानी और आत्महत्या जैसी घटनाओं की तथ्यात्मक पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी बनानी चाहिए।

इसमें सत्ताधारी दल, विपक्षी दल के सदस्य, स्वास्थ्य, कृषि, राजस्व व समाज कल्याण विभागों के स्थानीय प्रतिनिधि शामिल हों। वे मौके पर जाकर घर-परिवार, प्रधान, बीडीसी सदस्य और आसपास के लोगों से बात कर सही तथ्य पता लगाएं।

जांच में पता चल जाएगा कि मौतें भूख, गरीबी, फसलों की बर्बादी से हुईं या गृह कलह व अन्य बताई जा रही वजहों से। यदि भूख, गरीबी और फसलों की बर्बादी से मौत साबित हो तो उसमें आर्थिक सहायता दी जाए।

अगर किसी स्तर की लापरवाही हो तो कार्यवाही की जाए। इस हकीकत को स्वीकार करने के बाद ही सरकार ऐसे हालात न पैदा होने के कदम उठा सकती है। जब तक आत्महत्या को नकारने की नीयत से जांच होगी, हकीकत को नजरअंदाज कर तकनीकी बातों पर ही ध्यान दिया जाएगा, इस गंभीर समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

सर्वे रिपोर्ट पर मिलनी है मदद, पर घर बैठे हो जाता है सर्वे
आपदा के बाद राहत का सिस्टम किसानों के लिए और मुसीबत पैदा करता है। व्यवस्था है कि  आपदा के तत्काल बाद जिलाधिकारी लेखपालों के जरिये नुकसान का आकलन कराकर सरकार को बताएंगे। सरकार उन्हें मदद के लिए बजट देगी।  इसी सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक किसानों को मदद दी जाती है।

पर असली दिक्कत सर्वे में ही शुरू हो जाती है। किसानों की आम शिकायत यही है कि उनके नुकसान का सर्वे करने कोई आ ही नहीं रहा। घर बैठे रिपोर्ट तैयार हो रही है। पूछताछ में लेखपाल बताते हैं कि इलाके के नुकसान के आधार पर रिपोर्ट भेज दी। विधानसभा में विपक्ष लेखपाल सर्वे की विश्वसनीयता पर खुलकर सवाल खड़ा कर चुका है।

केंद्र की सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें

अब तक केंद्रीय अध्ययन दल तक नहीं आया सूबे में
किसानों के फसलों की बर्बादी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों से मन की बात कर चुके हैं और उनकी मदद का भरोसा दे चुके हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान मुख्य सचिव आलोक रंजन से प्राकृतिक आपदा से किसानों के नुकसान का विस्तार से जायजा लिया।

केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री संजीव बालियान पीएम के निर्देश पर प्रदेश में फसलों की बर्बादी का जायजा लेने आए। केंद्र की सक्रियता के साथ-साथ प्रदेश सरकार ने अपने स्तर से राहत की रकम बढ़ाई तो केंद्रीय सहायता के लिए 744.48 करोड़ का मांगपत्र भी 25 मार्च को केंद्र को भेजा।

मुख्य सचिव स्वयं केंद्रीय कृषि मंत्री से मिले। पर इस सारी कवायद की जमीनी सच्चाई ये है कि डेढ़ महीने की विपदा के बीच केंद्रीय अध्ययन दल तक प्रदेश में नहीं आ पाया है। केंद्रीय मदद इस दल की रिपोर्ट के बाद ही मिल पाएगी।

फसल बीमा योजना से राहत में भी देरी
प्रदेश सरकार ने फसल बीमा योजना से किसानों को तत्काल 25 प्रतिशत सहायता दिलाने का ऐलान किया था। बीमा कंपनियों को इसके निर्देश भी दे दिए गए। पर, किसानों की शिकायत है कि कंपनियों की ओर से भी कोई राहत राशि नहीं मिल पाई है।

आगे क्या करें?
उपकार के महानिदेशक राजेंद्र कुमार कहते हैं कि मुसीबत के मारे किसानों का हौसला बढ़ाने की जरूरत है। उनके दिमाग में यह बात बैठाने की जरूरत है कि  हालात बदलेंगे। वे ककड़ी, खीरा, तरबूज, जायद में बोई जाने वाली उर्द, मूंग व ढैंचा व सनई की खेती से काफी हद तक  इसकी भरपाई कर सकते हैं।

सदमे से मरा मुखिया, घर वालों को रोटी के लाले

मौसम की मार से आहत होकर रामगुलाम ने 12 दिन पहले ट्रेन के सामने कटकर जान दे दी। उसके परिवार को सरकार से कोई मदद मिल नहीं रही। रामगुलाम के घर वाले और गांव के लोग तो कहने लगे हैं, कहीं ऐसा न हो कि बर्बाद फसलों से खेत खाली कराने में ही घर की पूंजी खत्म हो जाए।

रामगुलाम के 80 वर्षीय पिता जंगी ने बताया कि इस साल करीब तेरह बिसवा गेंहूं बोया था। सब बर्बाद हो गया। बेटा सदमा नहीं सह सका तो ट्रेन से कट कर जान दे दी। आज भी रामगुलाम के वृद्ध पिता के हाथ में राहत के नाम पर डीएम द्वारा सौंपा गया राष्ट्रीय परिवारिक लाभ योजना का एक स्वीकृति पत्र है जिसमें तीस हजार रुपये उसके खाते में भेजने की बात कही गई है।

यह पैसा भी आज तक खाते में नहीं आया है। मुख्यमंत्री राहत कोष से 5 लाख रुपये मिलने का भी कुछ पता नहीं। जंगी का यह परिवार वर्ष 2002 में बीपीएल सूची में दर्ज हुआ लेकिन न तो बीपीएल कार्ड बना न ही कोई पेंशन मिली है।

500 किसान और 989 बीघे खेती वाले ककरी गांव के रामअकबाल, प्यारेलाल, बीरेंद्र श्रीवास्तव आदि बताते है कि आज तक फसलों का नुकसान देखने तहसील से कोई नहीं आया। कोई सर्वे भी नहीं हुआ। ऐसे में क्या उम्मीद करें कि कोई मदद मिलेगी।

बुद्धा नहीं रहे, अब घर चलाने के लिए उधार भी नहीं मिल रहा

खेत में खड़े गेहूं की बर्बादी सहन न कर पाने से किसान बुद्धा जाटव की 22 मार्च को सदमे से मौत हो गई। उसी खेत में जिससे उन्होंने परिवार की खुशी की उम्मीदें पाल रखी थीं।

परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। दो जून की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो रहा है, लेकिन शासन-प्रशासन की ओर से इस पीड़ित परिवार को भी अभी तक कोई मदद नहीं मिली है। बुद्धा के बेटे संतराम ने बताया कि एक भाई मंदबुद्धि के साथ-साथ विकलांग भी है।

बाकी के दो भाइयों का परिवार भी इसी जमीन पर निर्भर है। जो थोड़े-बहुत रुपये थे, पिता के अंतिम संस्कार में खर्च हो गए। अब तो गांव में उधार भी नहीं मिल पा रहा है। नुकसान तो औरों का भी हुआ है, लेकिन पड़ोसी किसानों का कहना था कि इस परिवार को फौरन मदद की जरूरत है।

सरकारी मदद की बात पर संतराम गुस्से से भर उठा। बोला, पिता की मौत के अगले दिन चारों भाइयों को तहसील बुलाया था। चार घंटे बैठाए रखा, कुछ कागजों पर अंगूठे लगवाकर लौटा दिया। इतनी मदद देने की नहीं सोची कि अंतिम संस्कार ही ठीक से कर पाते।
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मौत के बाद मिली थी सांत्वना मगर कुछ नहीं हाथ लगा

बेमौसम बारिश और ओले से खराब हुई फसल को देखकर मैकू लाल चल बसे थे। मीडिया में खबर आई तो अगले दिन लेखपाल से लेकर एडीएम तक पहुंच गए परिवार को सांत्वना देने। 7 लाख रुपये की मदद का आश्वासन भी दिया। पर 11 दिन बाद भी परिवार को एक पैसे की राहत नहीं मिली है।

छेदाबाजार पुरवा में ज्यादातर एक-दो बीघा के सीमांत किसान ही हैं। घर में सब्जी उगाकर और खेत में गेहूं-धान पैदा करके किसी तरह खाने-पीने का इंतजाम कर लेते हैं। लेकिन इस बार मौसम ने उस लायक भी नहीं छोड़ा।

धनीराम कहते हैं कि उनके पिता मैकू लाल को यही गम खा गया। इस परिवार के पास भी डेढ़ बीघा जमीन है। 18-19 मार्च को हुई बारिश के बाद पूरी फसल गिर गई। लोगों ने ढांढस बंधाया कि दो-चार दिन में फसल सीधी हो जाएगी।

प्रधान और गांव के दूसरे मुअज्जिज लोगों से नुकसान की भरपाई की गुहार लगाई, लेकिन कहीं से भी संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इस बीच फसल खड़ी नहीं हुई तो 25 मार्च को खेत से लौटते वक्त सदमे से उनकी मौत हो गई।

गांव के ही बुजुर्ग लुटई राम कहते हैं कि मैकूलाल बड़ा हिम्मत वाला आदमी था। पर इस बार नुकसान ही इतना ज्यादा हुआ है कि अच्छे-अच्छों की बर्दाश्त की सीमा से बाहर है। ऊपर से सरकारी मुलाजिमों की उपेक्षा उन्हें और भी गमजदा कर रही है।

धनीराम ने बताया कि उनसे तो तहसील वालों ने अभी तक कोई फॉर्म ही नहीं भरवाया है। घर आए अधिकारियों ने कहा था फसल बीमा योजना और राष्ट्रीय परिवारिक लाभ योजना के तहत लाभ जल्द ही दिलवा दिए जाएंगे।

घर में जो रुपये थे, वह पिताजी के अंतिम संस्कार में खर्च हो गए। अब इधर-उधर से उधार लेकर काम चला रहे हैं। वह सवाल करते हैं, अगर मदद नहीं देनी थी तो ये अफसर उनके घर आए ही क्यों।
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