लड़ाई राजधानी की है। पर, मुद्दा हैं अखिलेश और राजनाथ। सपाइयों की तरफ से अखिलेश यादव सरकार द्वारा लखनऊ में किए गए काम गिनाए जा रहे हैं तो यहां से सांसद केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश हो रही है।
तो भाजपाइयों की तरफ से सांसद राजनाथ सिंह की राजधानी के लिए की गई घोषणाओं को गिनाया जा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि प्रदेश सरकार के असहयोग के कारण इन योजनाओं के आकार लेने में देरी हो है।
साथ ही अटल बिहारी वाजपेयी की याद दिलाई जा रही है और बताया जा रहा है कि उनके समय किस तरह राजधानी की रंगत बदलने का काम हुआ था। बसपा की बात करें तो उसकी तरफ से दोनों ही दलों को कठघरे में खड़ा करते हुए स्मारकों व पार्कों का उल्लेख करते हुए राजधानी की सूरत संवारने के सरोकारों का हवाला दिया जा रहा है।
भले ही चुनाव से पहले भाजपा की होर्डिंग और बैनरों में अटल बिहारी वाजपेयी का चेहरा शामिल करने की जरूरत सूबे की भाजपा को महसूस न हुई हो, पर लखनऊ से चुनाव लड़ रहे भाजपाइयों को उनका नाम और काम याद आ रहा है।
अतीत के आंकड़ों को आधार मानें तो राजधानी की बिसात पर सपा-कांग्रेस गठबंधन के सामने विधानसभा चुनाव में मिले वोटों और भाजपा के सामने लोकसभा चुनाव में मिले वोटों के आंकड़ों को छूने की बड़ी चुनौती खड़ी दिखाई दे रही है। ग्रामीण इलाकों में बसपा के सामने भी अतीत को दोहरानी की चुनौती है।
वोट की खातिर याद आ रहे काम
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सपाइयों की तरफ से मेट्रो की शुरुआत, डॉ. राममनोहर लोहिया चिकित्सा संस्थान, जनेश्वर मिश्र पार्क, पुराने लखनऊ का सौंदर्यीकरण, लोकनायक जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर, गोमती रिवर फ्रंट व सौंदर्यीकरण, अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम, सचिवालय का नया भवन, लखनऊ हाट, शिल्पग्राम, सीजी सिटी, लखनऊ आगरा एक्सप्रेस-वे सहित राजधानी की बिजली व्यवस्था सुधारने के लिए एक दर्जन से ज्यादा पावर हाउस बनवाने के काम गिनाए जा रहे हैं।
भाजपाइयों की तरफ से सांसद राजनाथ सिंह की ओर से राजधानी के लिए नई रिंग रोड के निर्माण की घोषणा, गोमतीनगर रेलवे स्टेशन का विस्तार, सड़कों के विस्तार, मलिन बस्तियों के उद्धार और पार्कों के सौंदर्यीकरण जैसे कामों का बखान हो रहा है।बतौर सांसद अटलजी के कामों को गिनाया जा रहा है।
मसलन राजधानी में नालों व नालियों का सुधार, सड़कों के चौड़ीकरण, पुराने लखनऊ के कई हिस्सों में सीवर लाइन के विस्तार, कन्वेंशन सेंटर, सामूहिक समारोहों के लिए बनवाए गए कल्याण मंडपों, सामुदायिक केंद्रों, बारात घरों, यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए फ्लाई ओवर ब्रिजों, बालिकाओं की शिक्षा के लिए रोज राजकीय डिग्री कॉलेजों, गोमतीनगर में रेलवे स्टेशन, गोमती किनारे घाटों के सौंदर्यीकरण और कुड़ियाघाट के निर्माण, गरीबों के लिए पांच, दस व पंद्रह रुपये रोज पर आवास मुहैया कराने, कई पार्क बनवाने और फैजाबाद से रायबरेली व कानपुर रोड को जोड़ने के लिए शहीद पथ तथा सीतापुर रोड से कानपुर रोड को जोड़ने के लिए बनवाई गई रिंग रोड जैसे काम गिनाए जा रहे हैं।
काम गिनाने में बसपा भी पीछे नहीं है। उसकी तरफ से भी शहर और उसकी सीमा पर बनवाए गए पार्कों और मैदानों का हवाला दिया जा रहा है। राजधानी की दलित व मलिन बस्तियों में बसपाइयों की तरफ से अंबेडकर स्मारक स्थल जैसे कामों का भी उल्लेख करके वोट हासिल करने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था के साथ बसपा सरकार द्वारा कराए गए विकास के कामों का ब्यौरा दिया जा रहा है।
पार्टियों की परीक्षा इसलिए भी...
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राजधानी की विधानसभा की नौ सीटों में से सात पर 2012 में सपा ने न सिर्फ जीत हासिल की थी बल्कि काफी वोट भी प्राप्त किया था। सपा को सबसे ज्यादा 79,629 वोट बख्शी का तालाब में गोमती यादव को मिला था।
इससे ज्यादा वोट न तो पूरब सीट पर भाजपा से विजयी हुए कलराज मिश्र को मिला था और न कैंट से तब कॉंग्रेस के टिकट पर जीती डॉ. रीता बहुगुणा जोशी हासिल कर पाई थीं।
मलिहाबाद से जीते इंदल रावत को 62,782, सरोजनीनगर में शारदा प्रताप शुक्ल को 67,601, लखनऊ पश्चिम में रेहान को 49,912, उत्तर से जीते अभिषेक मिश्र को 47,580, मध्य से जीते रविदास मेहरोत्रा को 62,622 और मोहनलालगंज से जीती चंद्रा रावत को 69,488 वोट मिले थे।
पर, लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार मोहनलालगंज छोड़ सभी सीटों पर आगे रहे थे। सिर्फ मोहनलालगंज में बसपा नंबर एक पर थी और भाजपा से लगभग दो हजार वोट अधिक थे।
राजधानी में स्थित विधानसभा की अन्य सभी सीटों पर भाजपा, सपा व बसपा से काफी आगे रही थी। शहरी सीटों पर भाजपा के वोटों का आंकड़ा एक से डेढ़ लाख के बीच था। ग्रामीण क्षेत्र की बख्शी का तालाब और मलिहाबाद सीट पर भी भाजपा को लगभग एक-एक लाख वोट मिले थे।
जाहिर है कि भाजपा के सामने लोकसभा चुनाव में मिले मतों का आंकड़ा दोहराने की परीक्षा है तो सपा के लिए गठबंधन में शामिल कांग्रेस के वोटों को जोड़कर इन सीटों पर कब्जा बरकरार रखने की चुनौती खड़ी है।
लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले वोट अलग-अलग विधानसभा सीटों पर सपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों को मिले वोटों से ज्यादा थे। पूरब सीट पर तो 90 हजार से ज्यादा का अंतर था।
पर, विधानसभा के नतीजों की बात करें तो पिछले चुनाव में सपा और कांग्रेस को मिले वोट का आंकड़ा भाजपा को विधानसभा की सीटों पर मिले मतों को काफी पीछे छोड़ता दिखाई दे रहा है।
जाहिर है कि सपा और कांग्रेस गठबंधन के लिए जहां विधानसभा के नतीजे और आंकड़े दोहराना चुनौती है तो वहीं भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में राजधानी की सीटों पर मिली भारी बढ़त को बरकरार रखते हुए गठबंधन के उम्मीदवारों को शिकस्त देने की परीक्षा खड़ी है।
बसपा की बात करें तो उसके सामने 2007 में बख्शी का तालाब, मोहनलालगंज, सरोजनीनगर सीटों पर जीत को दोहराने की चुनौती है तो दलित वोटों की बहुतायत वाली मलिहाबाद सीट पर झंडा फहराकर दलित वोटों पर मजबूती साबित करने की भी परीक्षा है। इस पार्टी के लिए सबसे ज्यादा प्रतिष्ठापूर्ण सीट मोहनलालगंज है जहां लोकसभा चुनाव में भी भाजपा, बसपा पर बढ़त नहीं बना पाई थी।