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कहीं जाए भाजपा, राजनाथ के हाथ में तो 'राजयोग'

Thu, 03 Apr 2014 01:46 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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हवा के लिहाज से संतुलन साधने की कला और नए समीकरण बनाकर नई जगह सेट हो जाने में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह का कोई सानी नहीं है।
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उनके चुनावी व सियासी सफर पर नजर डालें तो यह बात पूरी तरह साबित भी हो जाती है।

विरोधियों की भारी भीड़ के बावजूद अपने फैसले करा लेने के कौशल में राजनाथ काफी माहिर रहे हैं। चुनावी मैदान में हारे लेकिन सियासत की सीढ़ियां चढ़ते रहे।

दिलचस्प बात तो यह है कि एक ही जगह से कई-कई बार जीत चुके पार्टी के नेताओं का आज भाग्य तय करने वाले राजनाथ आज तक अपना कोई स्थायी चुनाव क्षेत्र विकसित नहीं कर पाए।
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1974 में शुरू हुआ था सियासी सफर

राजनाथ का सियासी सफर 1974 में मिर्जापुर जैसे पिछड़े जिले में भारतीय जनसंघ के जिला मंत्री से शुरू हुआ।

आपातकाल के बाद 1977 में मिर्जापुर से जनता पार्टी के टिकट से चुनाव लड़कर वह पहली बार विधायक बने। पर, उन्हें दोबारा मिर्जापुर से जीत नसीब नहीं हुई।

इसके बावजूद वह संगठन में एक के बाद एक सीढ़ियां चढ़ते चले गए। जनसंघ के जिलाध्यक्ष फिर भाजपा युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बनते हुए 1986 में राष्ट्रीय अध्यक्ष के मुकाम तक पहुंच गए।

विधान परिषद सदस्य भी चुन लिए गए। वर्ष 1991 में वह कल्याण सिंह मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री भी बन गए।

हर ‌शिकस्‍त से ‌‌मिली कामयाबी

राजनाथ सिंह ऐसे नेता हैं जिनके लिए हर पराजय एक सफलता का संदेश लेकर आई। राजधानी से चुनाव लड़ने की चाहत में वह 1993 में विधानसभा की महोना सीट से चुनाव लड़े, जिससे यह तोहमत धुल जाए कि वे जमीनी नेता नहीं हैं।

लेकिन लगभग 59 हजार वोट हासिल करने के बावजूद हार गए। इसके बाद वे शांत नहीं बैठे। नए समीकरण साधे और राज्यसभा के सदस्य बन गए।

उन्हें 1997 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। वह ऐसे पहले अध्यक्ष रहे जिनके कार्यकाल में सत्ता बनाम संगठन का झगड़ा सार्वजनिक हुआ।

इसके बावजूद नेतृत्व की आंख के तारे बने रहे। कल्याण सिंह से ठनी तो उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में स्थान देकर पुरस्कृत किया गया।

भाजपा घटती रही, राजनाथ बढ़ते रहे

इसे किस्मत का खेल ही कहा जाएगा कि भाजपा घटती रही और राजनाथ सिंह आगे बढ़ते रहे। वर्ष 2000 में राम प्रकाश गुप्त की जगह उन्हें सूबे का मुख्यमंत्री बनाया गया।

उन्होंने एक बार फिर चुनाव जीतने की इच्छा पूरी करने की ठानी। पर, इसके लिए उन्होंने भाजपा के किसी विधायक से नहीं बल्कि कांग्रेस के तत्कालीन विधायक सुरेंद्र अवस्थी से त्यागपत्र दिलाकर राजधानी से सटी बाराबंकी की हैदरगढ़ सीट खाली कराई।

कुछ लोगों ने इसे उनका रणनीतिक कौशल कहा तो कुछ ने तिकड़म। लगभग 20 वर्ष बाद वह हैदरगढ़ से विधानसभा के दूसरी बार सदस्य बने।

यहीं से उन्होंने विधानसभा का 2002 का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। पर, उनके नेतृत्व में हुए इस चुनाव में भाजपा की सीटों का आंकड़ा 174 (1996) से घटकर 88 रह गया।

फिर खुला सफलता का दरवाजा

पार्टी की पराजय के बावजूद सिंह की सफलता का दरवाजा एक बार फिर खुला। उन्होंने दिल्ली की राह पकड़ी और दूसरी बार राज्यसभा सदस्य ही नहीं, केंद्रीय कृषि मंत्री भी बन गए।

केंद्र में भाजपा की सरकार चली जाने के बावजूद वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते रहे। यूपी में पार्टी की सीटों का आंकड़ा सिमटता रहा और वे 31 दिसंबर 2005 को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद तक पहुंच गए।

2009 का चुनाव गाजियाबाद से जीतकर लोकसभा सदस्य बने। पर, उनके तमाम दावों के बावजूद विधानसभा चुनाव 2012 में यूपी में भाजपा को सिर्फ 47 सीटें मिलीं।

सिंह का भाग्य एक बार फिर जगा और वे दूसरी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए। उम्मीद थी कि राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राजनाथ 2014 का चुनाव गाजियाबाद से ही लड़ेंगे।
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अब, अटल की खड़ाऊं में डाल दिए पैर

पर, नए समीकरण देखते हुए खुद को अटल की विरासत का उत्तराधिकारी साबित करने व राजधानी का नेता कहलाने की चाहत में वे लखनऊ से उम्मीदवार बन चुके हैं।

देखिए, राजनाथ का सियासी ग्राफ:
राजनाथ 2000 में मुख्यमंत्री बने।2002 के विधानसभा चुनाव में इनके नेतृत्व में पार्टी की सीटें 174 (1996) से घटकर 88 रह गईं।2005 में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।2009 के लोकसभा चुनाव भी इनके नेतृत्व में पार्टी ने लड़ा तो सीटें 138 (2004) से घटकर सिर्फ 116 ही रह गईं।
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