नेताजी और सीएम आजकल पार्टी नेताओं से बहुत कम मिल रहे हैं। इससे कई मंत्रियों और जिम्मेदार नेताओं में बेचैनी है।
दरअसल, नेताजी तभी कम मिलते हैं जब उन्हें कड़वे फैसले लेने होते हैं। इसका पहला असर मंत्रियों के कद में काट-छांट के रूप में सामने आ चुका है।
ठीक एक सप्ताह पहले हुई मंत्रियों की बैठक से पहले से ही उन्होंने ज्यादातर नेताओं से संवाद बंद कर रखा है। कमोबेश यही हाल मुख्यमंत्री का है। तमाम मिनिस्टर, नेता उनसे मिलने का वक्त मांग रहे हैं, वे एक-दो दिन बाद कहकर टाल रहे हैं।
कोई अपनी वजीरी की सलामती चाहता है तो किसी को जिला या प्रदेश संगठन में एडजस्टमेंट की चिंता है। पार्टी के एक जिम्मेदार नेता कहते हैं, पार्टी नेताओं से वक्ती किनाराकशी का मतलब साफ है।
सरकार में और फेरबदल या बिना सिफारिश के संगठन का पुनर्गठन। जाहिर है, बजट की तरह सरकार और संगठन में चुनावी नतीजों के बाद कुछ तो बदलाव आना ही है।