चुनाव से भले ही भाजपा के अच्छे दिन आ गए हों। पर, कई लोगों के अच्छे दिन चले गए। चुनाव प्रबंधन के बहाने जो रुतबा बनाया था।
वह मुसीबत बन गया है। चुनाव क्या निपटे उनके बैठने वाले वातानुकूलित कक्ष पर ताला डाल दिया गया। बेचारे! कहां जाएं, क्या करें।
बैठने की जगह है नहीं। कार्यालय में घूमते दिखते हैं तो लोग चुटकी लेते हैं, ‘अरे भाई! क्या बात है। काम नहीं बचा क्या। बात करने की फुर्सत मिल गई।’
कार्यालय नहीं जाते हैं तो घर वाले तंज कसते हैं, ‘पार्टी ने क्या फुर्सत दे दी। जो घर बैठे हो।’
बेचारे क्या करें और कहां जाएं। उस वक्त को कोस रहे हैं जब अच्छे दिन लाने के लिए घर-बाहर सभी जगह पंगा ले लिया था।