श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण के शुभारंभ पर अयोध्या पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साकेत की धरती से देश व दुनिया को कई संदेश व संकेत दिए। सबमें राम, सबके राम, इस्लामी देश इंडोनेशिया से लेकर नेपाल व श्रीलंका तक राम का उल्लेखकर अपनी सरकार की मंशा व सरोकारों को विस्तार दिया। इस दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तो ‘जय श्रीराम’ का नारा लगाया, लेकिन मोदी ने ‘सियापति रामचंद्र की जय’ का घोष किया।
शायद यह घोष उनकी उसी भावना का प्रतीक था कि यह मंदिर सबका है। राम सबके हैं। उन्होंने कई बार मां जानकी और मां सीता की महानता का उल्लेख किया तो ऐसा लगा कि वे जय श्रीराम का घोष करके किसी को चोट नहीं पहुंचाना चाहते। साथ ही वह नारी शक्ति के महत्व को भी लोगों को समझाना चाहते हैं।
सरयू तट पर आस्था की लहरों में सराबोर पीएम मोदी विगत छह वर्षों में अयोध्या व मंदिर को लेकर उठे सवालों और आरोपों का जवाब देने के मूड में दिखे। अयोध्या न आने, ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे, तिथि नहीं बताएंगे’ और ‘रामलाल टाट में राम के सहारे सत्ता पाने वाले ठाठ में’ जैसे तीखे हमलों का अपने ही अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने ‘रामकाज कीन्हें बिनु मोहिं कहा बिश्राम’ कहकर यही बताने की कोशिश की कि इन छह वर्षों में शांत व चैन से नहीं बैठे थे। राम मंदिर के संकल्प को साकार करने के साधन जुटा रहे थे।
चीन को संदेश...भय बिनु होई न प्रीत
प्रधानमंत्री ने ‘राफेल’ का नाम तो नहीं लिया, लेकिन रामचरित मानस की चौपाई ‘बिनु भय होय न प्रीति’ का उल्लेख करके यह बता दिया कि हमारा देश जितना ताकतवर होगा, उतनी ही शांति रहेगी। देश की सामरिक और विदेश नीति को उचित साबित किया। साथ ही संकेतों में यह भी बताने का प्रयास किया कि चीन हो या पाकिस्तान भारत न झुकेगा, न रुकेगा और न अपने निर्णयों से हटेगा।
विरोधियों को नसीहत
सियापति राम चंद्र की जय से शुरू कर इसी जयकार पर अपनी बात समाप्त करने वाले प्रधानमंत्री ने राम के सरोकारों का हवाला देते हुए मंदिर निर्माण की शुरुआत को वैश्विक खुशी व इच्छापूर्ति से जोड़कर विरोधियों का मुंह बंद करने की कोशिश की। मंदिर आंदोलन को आजादी के आंदोलन से जोड़कर और आजादी के दौरान प्राणोत्सर्ग करने वालों की राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान जान गंवाने वालों से तुलना कर उन्होंने विरोधियों का यह संदेश भी दे दिया कि उनकी आलोचनाओं से वह संकल्प तथा इरादे बदलने वाले नहीं है। तभी तो शायद उन्होंने बिना नाम लिए सोमनाथ और श्रीराम जन्मभूमि स्थल की तरफ संकेत करते हुए यह भी कहा कि इमारतें नष्ट हो गईं। आस्तित्व मिटाने का भी प्रयास हुआ लेकिन राम हमारे मन में बसे रहे।
हिंदुत्व की व्यापकता
उन्होंने सभी देशों और भारत के राज्यों में अलग-अलग पंथों के बीच राम के स्वरूप और चर्चित अलग-अलग रामायणों के उल्लेख के साथ राम की व्यापकता समझाकर तथा छत्रपति शिवाजी, सुहेलदेव, गुरु गोविंद सिंह से लेकर गिलहरी, केवट, निषाद और वानरों का उल्लेख कर राम को समाज के सभी वर्गों से जोड़कर सामाजिक समरसता के समीकरण भी साधने की कोशिश की। जिस तरह आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी का हर जाति व वर्ग ने सहयोग किया था उसी तरह राममंदिर आंदोलन की सफलता भी हर जाति व वर्ग की है, यह कहकर सामाजिक समरसता की भावनाओं तक विस्तार देकर हिंदुत्व की व्यापकता को भी सामने रखने की कोशिश की।