दसवीं जमात में थे फैज अहमद फैज, जब उन्होंने पहली बार नज्म
लिखी। इसके बाद शायरियों का जो कारवां शुरू हुआ वह फांसी के तख्त पर ही
खत्म हुआ।
मुल्क को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद कराने और तक्सीम होने से बचाने
में हर भरसक कोशिश की।
गालिब और इकबाल के बाद फैज ही ऐसे शायर थे,
जिन्होंने रूमानियत से लेकर मुल्कपरस्ती और इंसानियत से लेकर मुफलिसी तक पर
नज्में लिखीं। रविवार को उनकी शख्सियत के पीले पड़ चुके पन्नों पर जमी गर्द हटी।
दर्शक
संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में इस्प्रेसैरियो एशिया की
ओर से मंचित नाटक ‘कुछ इश्क किया कुछ काम’ देखने पहुंचे थे, जो
सियालकोट (पाकिस्तान) में जन्में शायर फैज की शख्सियत पर आधारित था।
नाटक
का मंचन फैज की जयंती की पूर्व संध्या पर हुआ। निर्देशन केके कोहली और लेखन
दानिश इकबाल का रहा।
फैज की शख्सियत की
गहराई मंच पर किरदार के जरिए ठीक से नहीं उतारी जा सकी। हालांकि, किरदार
निभाने वाले कलाकार शामिर के तलफ्फुज पर शक नहीं किया जा सकता। कलाकारों का
अभिनय भी ठीक ठाक ही रहा।