यूनान (ग्रीस) की एक पुरानी कहावत है कि किस्मत में लिखे को बदला नहीं जा सकता, लेकिन शहंशाह ईडिपस ने अपने मुकद्दर को बदलने की हरसंभव कोशिश की, पर नाकामयाब हुआ।
नतीजतन उसे कुदरत के आगे नतमस्तक होना पड़ा।
यह कहानी है करीब 26 सौ वर्ष पुराने सोफोक्लीज के ड्रामे ‘ईडिपस’ का, जिसका मंचन फ्रेंड्स एंड फ्रेंड्स एसोसिएशन की ओर से मंगलवार को संत गाडगे प्रेक्षागृह (एसएनए) में हुआ। निर्देशन वामिक व मिदहत खान ने किया।
शहंशाह ईडिपस की किस्मत में अपने पिता का कत्ल और अपनी ही मां से शादी करने की बात लिखी होती है, लेकिन इससे बचने के लिए कई कोशिशें करता है।
कहानी तमाम मोड़ों से होती हुई उसे किस्मत के उसी मोड़ पर लाकर छोड़ती है, जहां उसे इस सच का पता चलता है कि उसने ही अपने पिता का कत्ल किया और जिस पत्नी के साथ वह रह रहा है, वह उसकी मां है।
इसकी जानकारी मिलते ही उसकी पत्नी शर्मसार होकर फांसी लगा लेती है, जबकि ईडिपस आत्मग्लानि में अपनी आंखें फोड़ लेता है।
मंच पर ईडिपस की भूमिका में यूसुफ खान और उसकी पत्नी के रोल में शिवांगी मनीष रही।
जबकि मिदहत खान, फरीद खान, मो. सैफ, जावेद खान, हफीज खान, विष्णु पाण्डेय, निम्रा फारुखी, जिया फातिमा, शुभम शुक्ल, नवनीत, इदरिस, अकरम, जैद फुजैल, विनय, अनिल, आबिद, लइक, हसनैन, राशिद व मनोज का अभिनय भी ठीक ठाक रहा।