लखनऊ विश्वविद्यालय में स्नातक और परास्नातक पाठ्यक्रमों में दाखिले की प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है, लेकिन अभी तक पीएचडी और एमफिल के दाखिलों का अता-पता नहीं है। दाखिले तो दूर अभी तक पीएचडी का नया आर्डिनेंस तक तैयार नहीं हो सका है।
यही वजह है कि अभी तक विवि प्रशासन ने विभागों से पीएचडी की सीटों का ब्योरा तक नहीं मांगा है। विवि के विभिन्न संकायों में अभी तक प्रस्तावित आर्डिनेंस पर सहमति भी नहीं बन सकी है। ऐसे में इस साल भी विवि में पीएचडी और एमफिल दाखिलों पर देरी की मार पड़ेगी।
लखनऊ विवि के पिछले आर्डिनेंस में प्रवेश परीक्षा में 50 फीसदी अंक लाने की अनिवार्यता थी। नेट और जेआरएफ अभ्यर्थियों को प्रवेश परीक्षा से छूट दी गई थी, लेकिन राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा पास करने के बावजूद नेट पास अभ्यर्थी को साक्षात्कार के समय सामान्य पीजी छात्र की तरह ही रखा गया था।
विवि ने प्रवेश परीक्षा के नंबर के बजाय अंतिम मेरिट साक्षात्कार के आधार पर तैयार की। इसका नतीजा यह हुआ कि पीएचडी दाखिलों में विभागों मनमानी चली। यहां तक कि नेट और जेआरएफ अभ्यर्थी बाहर रह गए और सामान्य अभ्यर्थियों को दाखिला मिल गया। इस पर काफी आपत्तियां उठाई गईं। यहां तक कि राजभवन ने इस पर काफी नाराजगी जाहिर की थी।
इसी वजह से पीएचडी प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट भी महीने भर बाद जारी किया गया। राजभवन की आपत्ति के बाद पुराना आर्डिनेंस समाप्त करके नया तैयार किया जा रहा है। नए आर्डिनेंस पर आम सहमति नहीं बन पा रही है। इस वजह से पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकी है।
नेट-जेआरएफ का मुद्दा
लविवि के प्रस्तावित आर्डिनेंस में नेट-जेआरएफ अभ्यर्थियों को भी सामान्य पीजी अभ्यर्थियों की तरह रखा जा रहा है। इसका असर है कि एक बार फिर से नेट-जेआरएफ बाहर रह जाएंगे। राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा पास करने के बावजूद उन्हें दोबारा टेस्ट देने के लिए कहा जाएगा।
इस पर शिक्षकों का एक गुट सहमत नहीं है। उनका कहना है कि नेट-जेआरएफ को कुछ लाभ जरूर मिलना चाहिए। इसी को लेकर मामला सुलझ नहीं पा रहा है। इस वजह से पीएचडी आर्डिनेंस अभी तक तैयार नहीं हो सका है।