पीएफआई का लखनऊ में जाल फैला है। बीकेटी, गुडंबा, इंदिरानगर, गाजीपुर, सैरपुर, कैसरबाग, मदेयगंज, चौक, वजीरगंज इलाकों में नेटवर्क फैला है। पीएफआई के जिम्मेदार यूपी में बड़ा नेटवर्क तैयार करने के लिए युवकों को बरगला रहे थे। सुरक्षा एजेंसियों की जांच में सामने आया कि खाड़ी देशों से इस संगठन को बड़े पैमाने पर फंडिंग की जाती थी। यह रकम वहां से हवाला के जरिए भारत आती थी।
प्रतिबंधित संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) ने लखनऊ में अपना जाल फैला रखा है। प्रतिबंध के बाद नए संगठन की नर्सरी राजधानी के गांवों में लगा रखी थी। इसके जरिए युवकों को कट्टरता का पाठ पढ़ाते और हथियारों का प्रशिक्षण देते थे। राजधानी के बीकेटी, सैरपुर, गुडंबा व इंदिरानगर के मिश्रित आबादी वाले इलाकों में इनकी गहरी पैठ हो गई।
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इनका नेटवर्क गाजीपुर, कैसरबाग, मदेयगंज, चौक, वजीरगंज इलाकों में फैला है। गुडंबा से लेकर बीकेटी के बीच में अचरा मऊ का ग्राम प्रधान अरशद इस नेटवर्क की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसकी तलाश में सुरक्षा एजेंसियां पिछले एक साल से जुटी है। दो बार हाथ आने से पहले भाग गया।
सुरक्षा एजेंसियों के गिरफ्त में आये पीएफआई के जिम्मेदारों ने कुबूल भी किया कि यूपी में बड़ा नेटवर्क तैयार कर रहे हैं। इसके लिए कई इलाकों में ठिकाने बना रखे हैं। पीएफआई द्वारा रची जा रही साजिशों के लिए बैठकों का आयोजन शहर के सबसे भीड़भाड़ वाले इलाके में लाटूश रोड स्थित होटल मेजबान में होती थी। इस होटल में करीब सौ से अधिक बैठकों का आयोजन किया गया। जिसमें देश व विदेश के जिम्मेदार व एजेंट शामिल हुए।
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यहां हुई बैठकों में यह भी तय किया जाता था कि युवकों को कैसे संगठन से जोड़ा जाएगा। उनको आधुनिक प्रशिक्षण देने के बाद कहां व कैसे भेजना है। प्रशिक्षण के दौरान उनके घूमने-फिरने का पूरा इंतजाम कौन और कैसे करेगा। ताकि इसी लालच में संगठन से युवकों को जल्दी जोड़ा जाए।
प्रशिक्षण के लिए एक जिले के युवक को संगठन में शामिल करने के बाद दूसरे जिलों में प्रशिक्षण के लिए भेजा जाता था। युवकों को खास तौर पर यह ताकीद की जाती थी कि वह सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपना नेटवर्क बढ़ायें। साथ ही अपने संप्रदाय के युवकों को जोड़े।
देश व प्रदेश की सरकार के खिलाफ कराते थे वोटिंग
सरकार व उसकी नीतियों को गलत साबित करने के लिए पीएफआई नए तरीके से विरोध कर रहा था। इसके लिए पीएफआई की एक टीम सोशल मीडिया पर सक्रिय रहती थी। वह सरकार की नीतियों व योजनाओं के संबंध में जानकारी जुटाती और सक्रिय सदस्यों के बीच में भेजकर जनमत संग्रह कराती थी। पीएफआई इसके जरिये सरकार को गलत साबित करने में जुटा था। इसके कई प्रमाण पकड़े गये सदस्यों के मोबाइल से मिले हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, पीएफआई ने सोशल मीडिया पर लोगों से जुड़ने के लिए एक विशेष सेल का गठन किया था। इसे टेक्नोक्रेट सोशल मीडिया का नाम दिया था। इससे जुड़े सदस्य आधा दर्जन से अधिक यू-ट्यूब न्यूज चैनल चला रहे थे। 350 से अधिक सोशल मीडिया ग्रुप संचालित कर रहे थे। इन पर सरकार की योजनाओं की डिटेल डालते थे और मुस्लिम विरोधी करार देते। सरकार के खिलाफ जनमत संग्रह कराने के लिए कुछ समय तक वोटिंग कराते थे।
यू-ट्यूब चैनल पर कुछ मुस्लिम नेताओं को बैठाकर बहस भी कराते थे। इसके प्रसारण के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्म का इस्तेमाल करते थे। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक पीएफआई के सक्रिय सदस्य उलेमा काउंसिल की मदद से धार्मिक उन्माद फैलाने वाले वीडियो तैयार करते थे। उसे गांव व मोहल्लों में सोशल मीडिया के जरिए वीडियो को वायरल कराते थे।
गांव-गांव प्रशिक्षित कर केरल भेजने की थी तैयारी
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक नए संगठन को तैयार करने के लिए गांव-गांव घूमकर धर्म के प्रति कट्टर युवकों की तलाश करते थे। उनको अपने शब्दजाल में फंसाते थे। फिर उनके जरिए स्कूलों व कालेजों में छात्रों को यह संदेश दिलाते कि इस्लाम खतरे में है। उनको भड़काने व खुद को उनकी सुरक्षा कवच बताकर फंसाते थे। इबो बाद गांव-गांव में खोले गये अपने प्रशिक्षण शिविरों में ट्रेनिंग देते। इसमें मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग देकर प्रमाण पत्र दिया। इसके अलावा घरेलू सामान से हथियार बनाने का प्रशिक्षण भी दिया था।
इन प्रशिक्षित युवकों की खेप केरल भेजने की तैयारी थी। जहां पर संगठन के राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के पदाधिकारी उनको कुछ दिन हथियारों व धार्मिक कट्टरता का प्रशिक्षण देने वाले थे। इस बात की पुष्टि सुरक्षा एजेंसियों ने की है। पीएफआई के सदस्यों पर इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) की निगाह थी। आईबी के पास इस संबंध में कई पुख्ता सुराग थे। जिसमें लखनऊ के युवकों को केरल भेजने की बात भी शामिल है। वहीं, सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए पीएफआई मदरसा, धार्मिक शैक्षिक संस्थानों, संप्रदाय व अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से संचालित स्कूल व कॉलेज को निशाना बनाते थे। यहां अपने सदस्यों के जरिये युवकों से संपर्क करते थे।
खाड़ी देशों से हवाला के जरिए होती थी फंडिंग
सुरक्षा एजेंसियों की जांच में सामने आया कि खाड़ी देशों से इस संगठन को बड़े पैमाने पर फंडिंग की जाती थी। यह रकम वहां से हवाला के जरिए भारत आती थी। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक गल्फ तेजस डेली केरल मे प्रकाशित तेजस अखबार का एक बड़ा हिस्सा था। इस संगठन से जुड़े सदस्य के जरिए अखबार का निदेशक विदेश से आने वाली रकम देता था। दुबई के नामी रेस्टोरेंट के जरिए भी हवाला का रुपया पीएफआई को दिया जाता था। इसके अलावा पीएफआई के प्रचारक व सक्रिय सदस्य खाडी देशों में जकात का रुपया जुटाते हैं। इसके लिए वहां के पूंजीपति कारोबारियों को देश में मुस्लिमों पर अत्याचार की झूठी कहानी सुनाते हैं। उनसे मिले रुपये से आतंक की पाठशाला चलाते हैं। गरीबों की पढ़ाई व बीमारी के नाम पर मदद का नेटवर्क मजबूत किया था। इसी बुनियाद पर प्रतिबंध के बाद नए संगठन को भी खड़ा करने की तैयारी कर रहे थे।