मामले पर विश्व हिंदू परिषद के प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा कि श्रीराम जन्मभूमि के विवाद पर मध्यस्थता का औचित्य समझ से परे है। इसके पहले ऐसी कई कोशिशें हो चुकी हैं लेकिन इनका परिणाम क्या निकला? देश की जनता सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करती है। उन्हें जो भी करना है करके देख लें। हम मंदिर के लिए इंतजार कर लेंगे। हिंदू समाज ने 70 वर्षों से इसके लिए आहुतियां दी उसे मध्यस्थता से क्या प्राप्त होगा?
उन्होंने कहा कि जहां श्रीराम लला विराजमान हैं वह उनकी ही जन्मभूमि है। आक्रमणकारियों ने बलपूर्वक वहां बाबरी नाम ढ़ांचे को खड़ा किया। अब भव्य मंदिर के अलावा किसी भी प्रकार का ढ़ांचा हिंदू समाज स्वीकार नहीं करेगा। स्वतंत्र देश में गुलामी के इस प्रतीक का कोई स्थान नहीं है।
उन्होंने कहा कि पहले भी एक दर्जन से ज्यादा मौके आए यहां तक कि देश के प्रधानमंत्री तक ने मध्यस्थता कराने का प्रयास किया लेकिन मुस्लिम पक्ष सदैव ही इससे भागता रहा। संतों ने लाखों-करोड़ों राम भक्तों के सम्मुख यह घोषित कर रखा है कि अयोध्या की सांस्कृतिक सीमा मे मस्जिद का कोई औचित्य नहीं है। हिंदू समाज आज भी इन बातों पर कायम है।
आचार्य सत्येंद्र दास ने कहा कि कोर्ट ने जो मध्यस्थता की पहल के लिए पैनल बनाया है। उसमें अयोध्या का कोई प्रतिनिधि नहीं है। मध्यस्थता की प्रक्रिया एक तरह से मामले को लटकाने का ही प्रयास है। क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि इस तरह की कोशिश से मामले का समाधान निकल आएगा। उन्होंने कहा कि चाहे मध्यस्थता से या फिर कोर्ट के निर्णय से कुछ भी हो रामलला टेंट से बाहर आकर भव्य मंदिर में शीघ्र विराजमान हों, हम सभी यही चाहते हैं।
मध्यस्थता की पहल व्यर्थ की कवायदः त्रिलोकीनाथ
सखा रामलला त्रिलोकीनाथ पांडेय ने कहा कि कोर्ट जनभावनाओं के अनुसार चलती है। सबरीमाला केस इसका उदाहरण है। विवादित भूमि पर बाबरी मस्जिद नहीं बल्कि मुस्लिम पक्ष का विजय स्तंभ था। जो कि अपमान का सूचक और कलंक था। रामनगरी में मस्जिद बनें हम कभी भी ये स्वीकार नहीं करेंगे।उन्होंने कहा कि क्या गारंटी है कि जो पैनल बना है हिंदू समाज उसकी बात मान ही लेगा। यह एक बेकार की कवायद है।