काफी इंतजार के बाद पीसीएस से प्रमोट होकर सेक्रेटरी बने एक साहब प्रमोशन पाने के साथ ही ट्रांसफर के जुगाड़ में थे।
वजह वह अपने संपर्कों के नाते आश्वस्त थे कि आईएएस बनते ही कहीं न कहीं के कमिश्नर बना दिए जाएंगे। शुरुआत में बैच के कुछ साथी कमिश्नर बने। वह रह गए तो पैरवी करनी शुरू कर दी।
आश्वासन मिला कि जब भी ट्रांसफर होंगे, जरूर मौका मिलेगा। गांवों के लिए काम करते-करते ऊब चुके साहब जैसे ही ट्रांसफर की सुगबुगाहट होती, पता लगाते नजर आते कि उनका भी नाम है क्या? नियुक्ति विभाग के लोग मौज लेते हुए बताते हैं कि साहब जब भी ट्रांसफर की खबर पूछते तो कमिश्नर वाली बात दबा जाते।
मगर इतनी लिस्टें निकलीं, उनके नाम की दूर-दूर तक चर्चा नहीं। सो, इस बार जब नाम चर्चा के लिए आया तो शरारत सूझ पड़ी। सोचा-पता किया जाए कि आखिर साहब किस पोस्टिंग के लिए हर बार उतावले नजर आते हैं?
जैसे ही पता चला, तो साहब को टटोलने के लिए फोन घुमा दिया। उनको बहुप्रतीक्षित खबर की शुभ सूचना सुनाई। वह खुश हुए। चहक कर छूटते ही पूछे कि किस मंडल में हो रही है तैनाती? कोई टेंशन वाली कमिश्नरी तो नहीं मिल रही?
लेकिन जब उन्हें बताया गया कि उन्हें कमिश्नरी नहीं शासन में ही ‘मेहनत’ वाली जगह भेजा गया है तो वह ‘क्या’ कहते हुए अवाक रह गए।
फोन काट दिया। थोड़ी देर बाद साथी स्टाफ से पता चला कि चंद मिनट में ही ऑफिस से भी चले गए। चर्चा है कि इस वादाखिलाफी से उन्हें तगड़ा झटका लगा है। सदमे में हैं।