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पंचायत चुनाव : भाजपा को भारी पड़ा भितरघात, सपा व बसपा को भी आईना, हकीकत समझने की नसीहत

Tue, 04 May 2021 12:37 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी

सार

जिला पंचायत सदस्यों के नतीजों ने सियासी दलों को 2022 की चुनावी जमीन दिखा दी है। भाजपा को कई स्थानों पर मठाधीशों, सांसदों व विधायकों की मनमानी, भितरघात, कार्यकर्ताओं में बिखराव व नाराजगी के साथ जनता की बेरुखी का खामियाजा भुगतना पड़ा है।
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पंचायत चुनाव। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पंचायत चुनाव खासतौर से जिला पंचायत सदस्यों के नतीजों ने प्रदेश के सभी सियासी दलों को 2022 की चुनावी जमीन दिखा दी है। भाजपा को कई स्थानों पर मठाधीशों, सांसदों व विधायकों की मनमानी, भितरघात, कार्यकर्ताओं में बिखराव व नाराजगी के साथ जनता की बेरुखी का खामियाजा भुगतना पड़ा है। इससे भाजपा के कई पूर्व पदाधिकारी, पूर्व सांसद व पूर्व विधायक तथा जिला पंचायत अध्यक्ष के भावी उम्मीदवार चुनाव हार गए। 

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नतीजों पर नजर डालने पर सपा भाजपा को कड़ी टक्कर देती दिख रही है। आगरा जैसे कुछ जिलों में बसपा को भी अच्छी सफलता मिली है, लेकिन जिस तरह निर्दलियों ने दलीय उम्मीदवारों पर बढ़त बनाते हुए अपनी जीत का आंकड़ा भाजपा के करीब पहुंचा दिया है, वह भाजपा के साथ इन दोनों प्रमुख विपक्षी दलों के लिए भी आईना है कि विधानसभा चुनाव के लिए इन दलों को अभी काफी तैयारी की जरूरत है।

रही बात कांग्रेस की तो उसके लिए ये नतीजे दिल्ली ही नहीं, लखनऊ भी अभी बहुत दूर है का संदेश दे रहे हैं। कुछ स्थानों पर स्थानीय किसान नेताओं का जीतना और कहीं-कहीं आम आदमी पार्टी और भीम आर्मी के चंद्रशेखर की पार्टी से नतीजों में हुआ उलटफेर भी आगे की ही चुनावी कहानी ही कह रहा है। हालांकि पश्चिमी यूपी में कुछ स्थानों पर रालोद को मिली सफलता उसके लिए आगे ऊर्जा का काम करेगी।

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भाजपा के सामने सवाल

चुनाव नतीजों के रुझान में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरती तो दिख रही है, लेकिन तमाम तैयारियों के बावजूद पार्टी की जीत का आंकड़ा जिला पंचायत सदस्य की 3050 सीटों में से एक तिहाई के आसपास ही आकर सिमटता दिख रहा है। इससे पार्टी के पूरे चुनावी प्रबंधन पर बड़ा सवाल उठ रहा है। साथ ही यह सच्चाई भी समझाने की कोशिश की है कि पार्टी को यदि 2022 में जीत हासिल करनी है तो उसे इस तंत्र का पुनर्गठन करना होगा। वरिष्ठों की सलाह के बजाय सिर्फ  वर्तमान पदाधिकारियों की रिपोर्टिंग पर प्रत्याशी तय करना भारी पड़ा।

ये वजह तो नहीं
आखिर वे कौन से कारण रहे कि उज्ज्वला और किसान सम्मान निधि जैसे जिन फैसलों से जनता के बीच विरोधी भाजपा के सामने टिक नहीं पाते थे वे इस चुनाव में निष्प्रभावी कैसे हो गए? क्या कारण रहा कि कोरोना काल में जिन प्रवासी मजदूरों के लिए भाजपा ने इतना सब किया। उन्हें घर से लेकर गांव में रोजगार तक दिलाने का दावा किया। उसे उनके वोटों का लाभ भी नहीं मिला? कहीं ऐसा तो नहीं कि कोरोना के कहर के बीच ऑक्सीजन और मरीजों की भर्ती को लेकर जिस तरह पार्टी के विधायक और सांसद सार्वजनिक रूप से लाचारी व्यक्त करते नजर आए, उसका असर नतीजों पर पड़ा।

संदेश को न समझे तो मुश्किल
यह सवाल इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि 2015 में जब भाजपा सत्ता में नहीं थी तब उसके दावे के  ही मुताबिक प्रदेश में उसे 1000 के आसपास सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन इस बार जब बड़ी तैयारियों के दावे के साथ चुनाव लड़ी तो उस तुलना में पार्टी की सीटें नहीं बढ़ी तो क्या कारण रहा? गोंडा, अयोध्या, श्रावस्ती, बाराबंकी, वाराणसी, इटावा, एटा, अलीगढ़, हाथरस समेत तमाम स्थानों पर पार्टी के पूर्व और वर्तमान पदाधिकारी और दूसरे दलों से आए बड़े चेहरों को पराजय का सामना करना पड़ा। वह भी तब जब कई जिलों में सांसदों और विधायकों की सहमति से भी टिकट दिए गए। भाजपा को सभी से नहीं तो कम से कम ऐसे सांसदों और विधायकों पर तो हार की जिम्मेदारी तय करनी ही चाहिए।
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चेत सके तो चेत

चुनाव नतीजों का मतलब सपा और बसपा के लिए आगे की मंजिल की राह खुल जाना नहीं है। जिस तरह भाजपा को कई स्थानों पर निर्दलीयों के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा है वह विपक्ष के लिए भी बहुत कुछ कह रहा है। खासतौर से सपा और बसपा को यदि वापसी करनी है तो आत्ममंथन कर उन कारणों को दूर करने के लिए पूरी ताकत से जुटना होगा जिनके चलते गांवों से जुड़े इस चुनाव में लोगों की नजर में वे भाजपा का स्वाभाविक विकल्प नहीं बन पाए।

सपा-बसपा को भी अपने स्थानीय नेताओं, विधायकों और सांसदों की भूमिका का विश्लेषण करना होगा। रही बात कांग्रेस की तो नतीजों ने उसे एक बार फिर  यह समझाने की कोशिश की है कि उन्हें यदि वास्तव में यूपी में राजनीति करनी है तो नेतृत्व को पूरे संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए शून्य से शुरुआत करने की बात स्वीकार करनी होगी।

ये भी कहते हैं ये नतीजे
भाजपा नेतृत्व को तमाम बिंदुओं के साथ यह भी देखना चाहिए कि कहीं सांसदों, विधायकों, मंत्रियों और चुनाव प्रबंधन से जुड़े पदाधिकारियों को टिकट न देने का फैसला भारी तो नहीं पड़ा? प्रदेश के कई जिलों के नतीजों के विश्लेषण से यह साफ  दिखता है कि पार्टी की तरफ  से उतारे गए उन ज्यादातर चेहरों को हार का सामना करना पड़ा जिन्हें जिला पंचायत अध्यक्ष का संभावित दावेदार माना जा रहा था। ऐसा तो नहीं है कि इन स्थानों की जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर सांसदों, विधायकों और मंत्रियों  की नजर थी।

पर उनके परिवार को टिकट नहीं मिला तो उन्होंने खुद को तटस्थ कर लिया या किसी और का समर्थन कर दिया। बाराबंकी सहित पूर्वी यूपी के कुछ स्थानों पर भाकियू या स्थानीय स्तर पर कुछ अन्य किसान चेहरों की जीत यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किसान आंदोलन के प्रभाव को सिर्फ  पश्चिमी यूपी तक सीमित नहीं मानना चाहिए। राजनीतिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी मानते हैं कि भाजपा ने ध्यान न दिया तो जिला पंचायत चुनाव के साथ दिखा यह प्रभाव विधानसभा चुनाव तक विस्तार भी ले सकता है। आप और चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी की मौजूदगी आज भले ही बहुत विस्तारित नहीं दिख रही हो लेकिन ये दल स्थानीय समीकरणों और लोगों की भावनाओं से जुड़कर 2022 में भाजपा सहित बड़े दलों के चुनावी गणित को गड़बड़ा सकते हैं ।
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