बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा ईवीएम को निशाना बनाने पर सपा मुखिया अखिलेश यादव और कांग्रेस ने भी सहमति जताई थी। कांग्रेस यह तर्क दे सकती है कि उसने तो पहले ही बैठक में भाग न ले पाने के बारे में सूचना दे दी थी, लेकिन सवाल यह है कि ऐसी क्या व्यस्तता थी जो कांग्रेस का कोई सामान्य नुमाइंदा भी इस बैठक में भाग लेने की स्थिति में नहीं था।
वह भी तब, जब कांग्रेस ने सपा के साथ गठबंधन करके विधानसभा चुनाव लड़ा था। चुनाव के नतीजों के बाद भी दोनों तरफ से गठबंधन के स्थायी रहने के दावे किए गए थे। लेकिन जिस तरह बैठक से कांग्रेस दूर रही, उससे सपा और कांग्रेस के संबंधों के भविष्य पर भी सवाल खड़ा हो गया है।
राजनीति शास्त्री डॉ. एसके द्विवेदी कहते हैं कि इसकी वजह महत्वाकांक्षाओं का टकराव है। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में लोकतांत्रिक लिहाज से विपक्षी एकता समय की मांग है, लेकिन यहां मुश्किल यह है कि कौन किसका नेतृत्व स्वीकार करे।
मायावती बसपा से किसी को बैठक में भेजकर शायद यह संदेश नहीं देना चाहती थीं कि वह सपा के पीछे चलने को तैयार हैं। द्विवेदी की बात सही है। मायावती के स्वभाव में किसी का नेतृत्व स्वीकार करना नहीं है।
भाजपा से तीन बार हुआ अलगाव इसका प्रमाण है। रही बात कांग्रेस की तो उसके प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर कई मौकों पर गठबंधन पर असहमति के संकेत देते रहे हैं।
यहां तक कि विधानसभा चुनाव के दौरान गठबंधन होने के वक्त भी उन्होंने सपा कार्यालय में जाकर संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से मना कर दिया था। कांग्रेस के कई नेता भी अपने दम पर पार्टी को खड़ी करने की वकालत करते रहे हैं। माना जाता है कि बैठक से दूर रहकर कांग्रेस ने उसी नीति का संकेत दिया है।