लखनऊ। आधुनिकता के दावों के बीच आज भी किशोरियों के स्वास्थ्य और स्वच्छता को लेकर समाज में झिझक बरकरार हैं। डफरिन, झलकारी बाई और क्वीन मेरी अस्प्ताल के स्त्री रोग विशेषज्ञों के अनुसार, केवल 10 से 15 प्रतिशत अभिभावक ही बेटियों से मासिक धर्म पर खुलकर चर्चा करते हैं। संवाद की यह कमी किशोरियों में गंभीर शारीरिक और मानसिक समस्याओं का कारण बन रही है।
वीरांगना अवंती बाई (डफरिन) अस्पताल की वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. सरिता सक्सेना के अनुसार, ओपीडी में संक्रमण और अनियमित माहवारी की शिकायत लेकर आने वाली किशोरियों में भारी संकोच देखा जाता है। माहवारी को शर्म या डर से जोड़ने के कारण लड़कियां हीन भावना का शिकार हो रही हैं। शरीर में होने वाले बदलावों और जरूरी पोषण (जैसे आयरन की कमी) के प्रति भी माता-पिता जागरूक नहीं हैं।
पौष्टिक आहार न मिलने से किशोरियों में खून की कमी की समस्या तेजी से बढ़ रही है। मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों में स्थिति अधिक चिंताजनक है।
अभिभावकों के लिए जरूरी कदम
बेटी के 8 से 10 वर्ष की आयु के होते ही उसे शरीर में होने वाले प्राकृतिक परिवर्तनों के बारे में बताएं। इसे अशुद्धता के बजाय प्रजनन स्वास्थ्य से जोड़कर समझाएं। बेटियों को अपने साथ हमेशा सैनिटरी पैड और सैनिटाइजर रखने के लिए प्रेरित करें। डाइट में आयरन और कैल्शियम युक्त चीजें जैसे- पालक, गुड़, अनार और दूध अनिवार्य रूप से शामिल करें।