फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Lucknow News: अब प्याज की पूरे साल होगी खेती, बढ़ेगा मुनाफा

विज्ञापन
डॉ. सुतनु माजी अपनी टीम के साथ।  - फोटो : स्रोत : स्वयं
विज्ञापन
लखनऊ। अक्तूबर से लेकर मार्च के बीच प्याज की कमी की वजह से इसके दाम में होने वाली बढ़ोतरी से अब घबराने की जरूरत नहीं है। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के वैज्ञानिकों ने आठ वर्षों के शोध के बाद ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे खरीफ और लेट खरीफ मौसम में भी प्याज की भरपूर खेती की जा सकेगी।
विज्ञापन


बागवानी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुतनु माजी के निर्देशन में शोधार्थी डॉ. माता प्रसाद, डॉ. माया राम और डॉ. रमेश चंद्र मीणा ने यह तकनीक विकसित की है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इससे किसानों के लिए सालभर प्याज उत्पादन का रास्ता खुलेगा और प्याज की कमी व कीमतों में बढ़ोतरी को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकेगा।

डॉ. सुतनु माजी के अनुसार, भारत में प्याज एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक सब्जी है। सामान्यतः इसकी खेती रबी मौसम में होती है। अप्रैल-मई में तैयार फसल सितंबर-अक्तूबर तक बाजार में रहती है। इसके बाद अक्तूबर से मार्च के बीच आपूर्ति घट जाती है। इससे प्याज की कीमतों में तेज वृद्धि होती है। खरीफ मौसम में उत्पादन इस अंतर को कम कर सकता है। भारत प्याज उत्पादन में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। हालांकि, उत्पादकता अभी भी कम है। खरीफ में भी प्याज की सफल खेती के लिए सही किस्म का चयन, वैज्ञानिक तरीके से नर्सरी तैयार करना, समय पर रोपाई, जल निकासी और संतुलित पोषक प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण हैं।
विज्ञापन


अध्ययन में यह भी पाया गया कि लखनऊ क्षेत्र की क्षारीय मिट्टी (पीएच 7.6 से अधिक) में भीमा राज, भीमा शक्ति, एल-883 और एग्रीफाउंड डार्क रेड किस्मों ने बेहतर प्रदर्शन किया है। भीमा सुपर और एन-53 भी खरीफ मौसम के लिए उपयुक्त रहीं। शोधकर्ताओं के अनुसार, खरीफ प्याज की भंडारण क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है, इसलिए इसकी शीघ्र बिक्री अधिक लाभकारी रहती है।

नई तकनीक से मिलेगा चार गुना लाभ
डॉ. सुतनु माजी ने बताया कि इस तकनीक से खेती करने पर किसानों को चार से पांच गुना लाभ मिल सकता है। इसके लिए किसान अस्थायी संरक्षित ढांचे के तहत उठी हुईं क्यारियां बनाएं। मिट्टी का उपचार फॉर्मेलिन या कैप्टान से करें। खरीफ उत्पादन के लिए जुलाई के पहले सप्ताह से अगस्त तक बोआई करें। बोआई से पहले बीजों को थिरम से उपचारित करें। बीजों को 5-7 सेंटीमीटर की दूरी पर कतार में बोएं। एक एकड़ के लिए 4-5 किलोग्राम बीज पर्याप्त है। 40-50 दिन पौध रोपाई के लिए उपयुक्त है। अगस्त के अंतिम सप्ताह से अक्तूबर के पहले सप्ताह तक रोपाई करने पर अच्छी उपज मिलती है। रोपाई की दूरी 10×15 सेंटीमीटर रखें। जलभराव से बचाव की व्यवस्था करें। खेत की तैयारी के समय 20 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद मिलाएं। एनपीके उर्वरक 120:60:80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दें। किसानों को सलाह है कि वे कटाई से कम से कम सात दिन पहले सिंचाई बंद कर दें।
विज्ञापन

डॉ. सुतनु माजी अपनी टीम के साथ। - फोटो : स्रोत : स्वयं

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें