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लखनऊः ओम बिरला ने कहा, सदन को व्यवधान रहित चलाने के लिए बदले जाएं नियम

Fri, 17 Jan 2020 04:07 AM IST
संजीव कुमार झा अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
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सीपीए सम्मेलन को संबोधित करते लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला। - फोटो : अमर उजाला
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राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए) के भारत क्षेत्र और लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि सदन को बेरोकटोक चलाने के लिए विधानमंडलों व संसद के नियम बदले जाएंगे। उन्होंने कहा कि ऐसे सुझाव आए हैं कि सदन में व्यवधान को रोकने के लिए विधानमंडलों व संसद को कठोर नियम बनाने चाहिए। सदन की गरिमा इसी में है कि वाद-विवाद हों, सहमति-असहमति हो, पर कार्यवाही निर्बाध रूप से चलनी चाहिए।

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ओम बिरला  ने  गुरुवार को लखनऊ में विधानसभा के मुख्य मंडप में राष्ट्रमंडल संसदीय संघ, भारत क्षेत्र के 7वें सम्मेलन के उद्घाटन सत्र पर यह बात कही। उन्होंने कहा कि हमें सांसदों और विधायकों को शून्य काल में अधिक से अधिक बोलने का अवसर देना चाहिए। जरूरी हो तो इसके लिए शून्य काल का समय बढ़ाना चाहिए।

बिरला  ने कहा- राजनीतिक बहुलवाद हमारे लोकतंत्र का मर्म है। इसमें सहमति-असहमति, पक्ष और विरोध चलता रहेगा लेकिन सदस्यों को लोकतांत्रिक मानदंडों के भीतर रहते हुए अनुशासन और संयम के साथ अपनी बात रखनी चाहिए। पीठासीन अधिकारियों को भी सदस्यों की आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए। नियमों और परंपरा के अनुसार ठीक से सदन चलाना चाहिए।

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यूपी देवभूमि... मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं

ओम बिरला  ने कहा, हम गोमती के किनारे बसी सुंदर नगरी लखनऊ में चर्चा, विचार-विमर्श एवं संवाद के लिए एकत्र हुए हैं। उत्तर प्रदेश को देवभूमि भी कह सकते हैं। लखनऊ शहर की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत रही है। इस शहर के लिए बड़ी पुरानी कहावत है, मुस्कराइए कि आप लखनऊ में है।

उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी बढ़ी है। संसद व विधानमंडलों का दायित्व है कि वे जनता के भरोसे पर खरा उतरें। प्रत्येक सांसद और विधायक राष्ट्र के आदर्शों, आशाओं और विश्वास के अभिरक्षक हैं। जनप्रतिनिधि के रूप में लोकतंत्र में उनका दर्जा बहुत ऊंचा है। गरीबों का जीवन स्तर उठाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।’
 

सरकार व जनता के बीच के सेतु हैं निर्वाचित प्रतिनिधि

ओम बिरला ने कहा कि हमारा देश विविधताओं वाला है। विविधता में एकता हमारी पहचान रही है। लोकतंत्र में निवाचित प्रतिनिधि की बड़ी भूमिका होती है। वह सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करते हैं।

वे जन अपेक्षाओं और आकांक्षाओं से सदन के माध्यम से सरकार को अवगत कराते हैं। नीति निर्धारण में उनकी अहम भूमिका होती है। उन्हें सदन के साथ ही संसदीय समितियों से भी समस्याओं का समाधान कराना चाहिए।

वैदिक काल से लेकर आज तक लोकतंत्र में हमारी आस्था की जड़ें बहुत गहरी हैं। लोकतंत्र हमारे राष्ट्र की आत्मा है। लोकसभा, राज्य विधान मंडलों और अन्य लोकतांत्रिक निकायों ने चुनावों का सफल संचालन और निर्वाचन प्रक्रिया में लोगों की सक्रिय भागीदारी ने इस प्रणाली में उनकी अगाध आस्था और विश्वास को दर्शाया है। आजाद भारत में चुनाव दर चुनाव मतदान प्रतिशत का बढ़ना दिखाता है कि लोकतंत्र के प्रति जनता का भरोसा प्रगाढ़ हुआ है।
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वंचितों, गरीबों, अभावग्रस्तों की जिंदगी में बेहतरी लाए

उन्होंने आगे कहा कि इस पर विचार करने की जरूरत है कि भारत के संसदीय रीति-रिवाजों, परंपराओं को कैसे ऊंचा कर सकते हैं। उनका मानना है कि सदन की कार्यवाही बाधा रहित और सुचारु रूप से चलना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी है।

पीठासीन अधिकारियों को बिना व्यवधान के सदन चलाने के लिए नियम बनाने चाहिए। उन्होंने उम्मीद जताई कि उत्तर प्रदेश में इस सम्मेलन से संसदीय परंपराओं का नया इतिहास बनेगा। उन्होंने कहा, सभी लोकतांत्रिक देशों में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने की होड़ है।

राष्ट्रमंडल संसदीय संघ में 57 देशों का प्रतिनिधित्व है। संसद व विधानमंडलों के सदन  वंचितों, गरीबों, अभावग्रस्त लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाने में उपयोगी साबित होने चाहिएं। सदनों को लोकतांत्रिक बनने का प्रयास करना चाहिए।

अटलजी का स्मरण किया

ओम बिरला  ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को याद कर कहा कि उत्तर प्रदेश, भारतीय राजनीति के गढ़ के रूप में जाना जाता है। आजादी की लड़ाई ही नहीं, स्वतंत्रता के बाद भी यूपी के लोगों ने वरिष्ठ पदों पर रहकर देश को सक्षम नेतृत्व दिया। देश को कई प्रधानमंत्री दिए हैं। आज लखनऊ की धरती पर खड़े होकर अटल बिहारी वाजपेयी का सहज की पुण्य स्मरण आता है, जिनका इस देश के लोकतंत्र में बड़ा योगदान रहा है।
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