कोठी हयात बख्श- तो राज भवन में डांसिंग फ्लोर भी था!
कोठी हयात बख्श आज के राज भवन का इतिहास करीब 200 साल पुराना है। इस महलनुमा कोठी को बनाने का श्रेय जनरल क्लाउड मार्टिन को ही जाता है।
वह यहां अपने सुरक्षादलों और हथियारों को रखते थे। हयात बख्श का अर्थ है जीवन दायिनी और वाकई यह कोठी अपने नाम के अनुरूप ही रही।
उस दौर में बनने वाली कोठियों में भारतीय परंपरा को वरीयता नहीं दी जाती थी, न ही आंगन के लिए जगह छोड़ी जाती थी। यह कोठी भी उस चलन से अछूती नहीं रही।
इस दो मंजिला कोठी की सारी दीवारें सपाट हैं और उनपर कोई नक्काशी नहीं उकेरी गई हैं। हां, इसके दरवाजे और खिड़कियों पर गोथिक शैली की नक्काशी देखते बनती है।
कोठी के चारों ओर ऊंची छत वाले बरामदे हैं। कोठी में सिर्फ राजदरबार ही एक ऐसी जगह है, जहां आपको भारतीय वास्तुकला दिखेगी। दीवानखान के मेहराब पर की गई सुनहरे रंगों की चित्रकारी ध्यान खींचती है।
साल 1830 में बादशाह नसीरूद्दीन हैदर के शासनकाल में इस कोठी में कर्नल रॉबर्ट्स रहते थे। सर हेनरी लॉरेंस भी यहां अक्सर आते। मेजर जॉनशोर बैंक अवध के मुख्य आयुक्त बनने के बाद इस कोठी में रहे और इस वजह से ही बाद में इसे बैंक कोठी भी कहा जाने लगा।
कोठी के पश्चिमी दरवाजे से कैसरबाग की ओर जाने वाली सड़क को बैंक रोड पुकारा जाने लगा।1857 में मेंजर बैंक की मौत के बाद ब्रिटिश आर्मी का कार्यभार ब्रिगेडियर रशेल ने लिया और तब यह कोठी हेडक्वार्टर के रूप में प्रसिद्ध हुई। वर्ष 1873 में सर जॉर्ज कूपन ने यहां लॉन, फव्वारे का निर्माण कराया।
राजभवन के उत्तरी दिशा में एक बड़ा चारागाह और अस्तबल था। घोडे़ और दूसरे जानवरों की देख-रेख के लिए यहां अक्सर ही कुछ लोग रहते, जिन्हें नालदार कहा जाता था।
इन लोगों के लिए यहीं पर एक मस्जिद भी थी, जिसे नालदार की मस्जिद कहा जाता था। इसे आज भी विधान सभा के पीछे देख सकते थे।
आपको जानकर ताज्जुब होगा कि साल 1907 में इस कोठी के कुछ हिस्से तोड़कर बाथरूम और डांसिंग रूम बनाया गया, जहां यूरोपियन जोड़े डांसिंग फेस्टिवल मनाते थे।
जहां यह डांस फ्लोर था उसे आज हम अन्नपूर्णा कक्ष के नाम से जानते हैं। देश आजाद होने के बाद इस कोठी को राज भवन नाम दिया गया।