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पोषाहार आपूर्ति: दो साल से बिना बारकोडिंग के चलता रहा खेल, कंपनियों की मनमानी पर आंखें मूंदे रहे अफसर

Fri, 29 May 2020 09:29 AM IST
शाहरुख खान सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला, लखनऊ
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फाइल फोटो
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पोषाहार आपूर्ति में पंजीरी सिंडिकेट और बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार विभाग के अधिकारियों की सांठगांठ से एक और खेल सामने आया है। सिंडिकेट को आपूर्ति का ठेका देने के लिए टेंडर में पोषाहार के पैकेट पर बारकोडिंग करने की शर्त थी, मगर आपूर्ति बिना बारकोडिंग के होती रही। 
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पोषाहार की आपूर्ति करने वाली 14 कंपनियां यह खेल करती रहीं, मगर जिम्मेदार आंखें मूंदे रहे। मामला तब सामने आया है जब सरकार ने टेंडर में अनियमितता की सतर्कता जांच के साथ ही संबंधित अधिकारियों की सेवा संबंधी अभिलेखों को तलब किया।  

प्रमुख सचिव बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार वीना कुमारी ने जांच के बाद उप सचिव शिवराज सिंह यादव को निदेशक बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार से निदेशालय स्तर पर काम देख रहे जिला कार्यक्रम अधिकारी समेत अन्य अधिकारियों व कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई किए जाने का प्रस्ताव मांगा है।
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भाजपा एमएलसी ने उठाया था मुद्दा
पोषाहार आपूर्ति का ठेका वर्ष 2018 अप्रैल में दो साल तक के लिए पंजीरी सिंडिकेट के नाम से विख्यात उन 14 कंपनियों को दिया गया, जिनका यूपी में इस धंधे पर कब्जा है। 
 

तब टेडर की शर्तों पर भी सवाल उठे थे। सत्ताधारी दल से एमएलसी देवेन्द्र प्रताप सिंह ने विधान परिषद में मामला उठाकर टेंडर निरस्त कर जांच कराने की मांग की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि टेंडर में जानबूझकर कुछ ऐसी शर्तों लगाई गई ताकि सिंडिकेट के बाहर की कंपनियों को बाहर रखा जा सके। 

बारकोडिंग इसलिए...ताकि गड़बड़ी की जवाबदेही तय हो
पोषाहार आपूर्ति के टेंडर में एक शर्त ‘स्मार्ट इन्वेंटरी मैनेजमेंट सिस्टम’ यानि पोषाहार के सभी पैकेटों की अनिवार्य रूप से ‘बारकोडिंग’ की थी। यह काम आपूर्तिकर्ता कंपनियों के स्तर पर ही किया जाना था। ‘बारकोडिंग’ करते समय जिला, तहसील व ब्लाक के साथ ही आंगनबाड़ी केंद्रों तक के नाम शामिल करना भी अनिवार्य किया गया था।

चूंकि बार कोडिंग के लिए अलग से प्लांट लगाना पड़ता है, इसलिए छोटी कंपनियां दौड़ से बाहर हो गईं। सिंडिकेट वाली 14 कंपनियों को ठेका मिला। यह शर्त इसलिए लगाई गई थी कि किसी आंगनबाड़ी केंद्र पर आपूर्ति पोषाहार की गुणवत्ता में कमी पाए जाने पर आसानी से यह पता लगाया जा सके कि संबंधित पोषाहार का पैकेट किसी कंपनी से आया है। 
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यह खेल...तत्कालीन निदेशक ने 6 माह की ढील दी, फिर बारकोडिंग लागू करने की पहल ही नहीं की

हैरानी की बात यह है कि टेंडर के आधार पर दो साल तक कंपनियों द्वारा पोषाहार की आपूर्ति बिना ‘बारकोडिंग’ के ही होता रही। सूत्रों के मुताबिक कई जिलों में खराब गुणवत्ता और पुराने व कम पौष्टिकता वाले पोषाहार पकड़े भी गए, लेकिन ‘बारकोडिंग’ न होने की वजह से किसी कंपनी व अधिकारी की जिम्मेदारी तय नहीं हो पाई।

टेंडर की शर्तों की अनदेखी का खेल अधिकारियों द्वारा शुरू से ही खेला जा रहा है। टेंडर की शर्तों के मुताबिक बारकोडिंग के लिए कंपनियों को अपने यहां ही मशीन लगानी थी। कंपनियों ने तत्कालीन निदेशक राजेन्द्र कुमार सिंह से इसके लिए समय मांगा। तब राजेन्द्र सिंह ने कंपनियों को पहली बार तीन महीने और दोबारा में फिर से तीन महीने का समय दे दिया। 

कुल मिलाकर शर्त को भूलने के लिए अधिकारियों ने दो बार ने छह महीने तक बारकोडिंग की व्यवस्था को लागू नहीं होने दिया। इसके बाद दो बाकी के डेढ़ साल तो किसी ने इस शर्त को लागू कराने की पहल ही नहीं की।
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