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7 वजहें, क्यों मची है मोदी-अटल पर 'महाभारत'

Tue, 11 Mar 2014 05:11 PM IST
शिशिर द्विवेदी/अमर उजाला, लखनऊ
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धीरे-धीरे भारतीय जनता पार्टी में लखनऊ को लेकर चल रहे घमासान के ड्रामे से परदा उठ गया है।
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जहां बड़े नेता इस सीट पर दावेदारी के लिए बयानों के तीर छोड़ रहे हैं तो स्थानीय नेता भी परदे के पीछे से ही सही, अपने मोहरे जमा रहे हैं।

इस खेमेबंदी का तरीका अलग भले ही हो पर मकसद सबका एक ही है- पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के इस राजनीतिक दुर्ग की किलेदारी को पाना।

भाजपा के दिग्गज नेताओं ने लखनऊ लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर अटलजी का असली वारिस बनने का मोह यूं ही नहीं पाल रखा है।

इसके पीछे पुख्ता वजह है

राजनीतिक सफर में अटलजी का हर तबके को स्वीकार होना। इसलिए चाहे पार्टी के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी हों या राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह, अतीत के उन पन्नों पर नजर गड़ाए हैं।

जिनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कई मुद्दों पर मतभेद व इसके चलते पहली पसंद न होने के बावजूद संघ द्वारा अटलजी को प्रधानमंत्री बनाने की इबारत दर्ज है।

पिछले दिनों लखनऊ में हुई रैली में मोदी का अटल की तारीफ करना हो या राजनाथ का लखनऊ के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देने का भावुक भाषण, इन सबके पीछे प्रेरणा एक ही थी कि उन्हें अटल का असली वारिस।

और राजनाथ की नजर चुनाव बाद के समीकरण पर

राजनाथ चुनावी कैनवस में अटल की जगह अपनी तस्‍वीर फिट करना चाहते हैं। उन्हें पता है कि लखनऊ से चुनाव जीतेंगे तो अटल की तरह ही सर्वमान्य का सर्टिफिकेट भी मिल जाएगा।

चुनाव बाद बनने वाले समीकरण में अगर मोदी थोड़ा भी मिस फिट होते हैं तो विरासत की यह थाती उन्हें प्रधानमंत्री के मुकाम तक ले जा सकती है।

राजनाथ की महत्वाकांक्षा तभी पूरी हो सकती है जब लोग उन्हें अटलजी की तरह स्वीकार कर लें और लखनऊ की परंपरागत लोकसभा सीट इसके लिए सर्वोत्तम निमित्त है।

टंडन नहीं छोड़ना चाहते हैं सीट

लखनऊ के वर्तमान सांसद लालजी टंडन भी खुद को अटलजी का स्वाभाविक वारिस मानते हैं अटल जब भी लखनऊ से चुनाव लड़ते थे, टंडन उनके इलेक्शन एजेंट व प्रबंधक की भूमिका में होते थे।

बाद में पार्टी ने यह सीट उन्हें सौंप दी। अब वे येनकेन प्रकारेण इस कवायद में जुटे हैं कि लखनऊ से उन्हें ही लड़ने का मौका मिले।

सोमवार को उन्होंने अपने बयान में यह बात साफ भी कर दी।

टंडन बेटे को सौंपना सौंपना चाहते हैं यह जमीन

टंडन ने अटल की विरासत अगली पीढ़ी को भी सौंपने में कोई कसर नहीं उठा रखी। इस बात को पुख्ता करते हैं वे आरोप जो 2009 में टंडन जी द्वारा खाली की गई विधानसभा सीट के उपचुनाव में उन पर लगे थे।

तब लोकसभा चुनाव जीतने के बाद लालजी टंडन से इस्तीफे से रिक्त हुई विधानसभा सीट पर भाजपा ने अमित पुरी को प्रत्याशी बनाया था।

टंडन जी पर पुरी को सहयोग न करने के आरोप इसलिए लगा क्योंकि वे किसी और को अटलजी के क्षेत्र में विरासत का दावेदार नहीं बनने देना चाहते थे।

वे अपने पुत्र के लिए जगह सुरक्षित करना चाहते थे। यह बात अलहदा है कि जब 2012 के विधानसभा चुनाव में टंडन के पुत्र गोपाल टंडन को उसी सीट से टिकट दिया गया तो वे हारने के साथ ही तीसरे नंबर पर खिसक गए।

दिनेश शर्मा भी होड़ में

अटल का उत्तराधिकारी बनने की दौड़ में लखनऊ के महापौर दिनेश शर्मा भी हैं। दो बार मेयर का चुनाव जीत चुके शर्मा को लगता है कि अब गोमती के जल से निकलकर सियासत के सागर में अठखेलियां करने का वक्त आ गया है।

दिनेश के बारे में कहा जा रहा है कि अगर वह लखनऊ से लड़ते हैं, तो उन्हें लालजी टंडन से ज्यादा वोट मिलेंगे। क्योंकि लालजी टंडन का लखनऊ में अब जनाधार लगभग खत्म हो चला है।
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कलराज मिश्र भी दम के साथ ठोंक रहे दाव

कुछ दिन पहले तक दिग्गज नेता कलराज मिश्र भी लखनऊ सीट पर अपनी दावेदारी जता रहे थे। लंबा सियासी जीवन, संसदीय अनुभव व अटल जी से उनकी निकटता इस दावे का मुख्य आधार थे।

लेकिन इस बीच जब पार्टी के शूरमाओं को अटलजी की लखनवी विरासत के लिए म्यान समेत तलवारें निकालते देखा तो उन्हे समझ में आ गया कि लोकसभा चुनाव के बाद ये म्यान से बाहर भी आ सकती हैं।
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