लखनऊ। सरकारी संस्थानों में 25 हजार मरीज रोजाना ओपीडी पहुंचते थे। पर, दो दिन से ओपीडी पूरी तरह से बंद हैं। मर्ज बढ़ रहा है। मौतें भी हो रही हैं। सरकारी संस्थान दावा कर रहे हैं कि वे टेलीमेडिसिन की सुविधा दे रहे हैं। पर, टेलीमेडिसिन कितना कारगर है ये बड़ा सवाल है। निजी अस्पतालों में भी करीब 10 हजार की ओपीडी होती थी। पर, अब ये सब करीब-करीब बंद है। इमरजेंसी वाले या जिनकी सर्जरी या कीमोथेरेपी अटकी है, उनकी सांसें अटकी हुई हैं। निजी अस्पताल इसलिए डरे हुए हैं कि कोरोना का एक भी केस मिला तो उनका अस्पताल सील हो सकता है। ऐसे में 35 हजार रोजाना आने वाले मरीजों के लिए कोई विकल्प नहीं है। मरीजों की हालत खराब हो रही है तो निजी अस्पतालों को लेकर पेंच अटका हुआ है। स्वास्थ्य विभाग दावा करता है कि निजी अस्पतालों को खोलने का आदेश दिया गया है लेकिन निजी चिकित्सा संस्थान मरीजों का इलाज करने की खुद हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। पर, जितनी सहजता से स्वास्थ्य विभाग दावा कर रहा है, निजी अस्पतालों के लिए उतना सबकुछ सहज नहीं है। कारण-एक भी केस पॉजिटिव आने पर तालाबंदी के साथ ही बनी बनाई साख भी धूमिल होने का भी खतरा है। ये डर इतना बड़ा है कि कोई रिस्क लेना नहीं चाहता। ---------- इन आंकड़ों को पढ़े और खुद अनुमान लगाएं हालात कैसे हैं इसके लिए आंकड़ों पर गौर करना होगा। केजीएमयू में 4500 बेड हैं। स्ट्रेचर पर भर्ती होने वाले मरीजों को भी जोड़ दिया जाए तो 5500 मरीज नियमित तौर पर रहते थे। इन दिनों यह संख्या हजार के आसपास आ गई है। यहां की ओपीडी में प्रतिदिन करीब 10 हजार मरीज आते रहे हैं। ओपीडी के जरिए ही प्रतिदिन करीब एक हजार मरीजों को भर्ती किया जाता रहा है। इसी तरह विलय के बाद लोहिया संस्थान में भी करीब पांच हजार मरीज ओपीडी में आते रहे हैं। पीजीआई में करीब एक हजार नए मरीज ओपीडी में देखे जाते थे। सिविल अस्पताल में करीब तीन हजार, बलरामपुर अस्पताल में चार से पांच हजार मरीज ओपीडी में आते रहे हैं। लोकबंधु, ठाकुरगंज में भी करीब डेढ़ से दो हजार मरीज देखे जाते थे। नर्सिंग एसोसिएशन के आंकड़ों के मुताबिक राजधानी में हर दिन निजी अस्पतालों की ओपीडी में करीब 10 हजार मरीज देखे जाते रहे हैं। इसी तरह करीब 500 मरीज भर्ती किए जाते रहे हैं। पर, अब इन मरीजों के पास इलाज के लिए कोई अच्छा ऑप्शन नहीं है। ------ ओपीडी में आने वाले 10 फीसदी मरीज होते हैं गंभीर, पर क्या उन्हें इलाज मिल पा रहा सीएमओ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देश के तहत ओपीडी बंद की गई है। कोरोना से बचाव के लिए यह जरूरी था। वह दावा करते हैं कि इमरजेंसी में इलाज की व्यवस्था है। अति गंभीर मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। पर, चिकित्सा विशेषज्ञों का अनुभव है कि ओपीडी में आने वाले 10 फीसदी मरीज गंभीर की श्रेणी में होते ही हैं। अब ओपीडी बंद हैं तो ऐसे में सवाल है कि क्या इन 10 फीसदी मरीजों को इमरजेंसी में इलाज मिल पा रहा है? इसका किसी के पास ठोस जवाब नहीं है। निजी अस्पताल संचालकों का तर्क : इलाज भी करें और अपयश भी लें राजधानी के कई निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि इमरजेंसी में आने वाले मरीजों का इलाज करते हैं और कोई मरीज पॉजिटिव पाया जाता है तो डॉक्टर के साथ दुर्व्यवहार होता है। उनका कहना है कि अस्पताल सील करने को लेकर लगातार विरोध जताया गया। इस दौरान खुलकर सामने आने वालों को तरह तरह से कार्रवाई का डर दिखाया जा रहा है। जबकि मरीजों का इलाज करने में उनके खुद कोरोना संक्रमित होने का खतरा होता है। उनका पूरा परिवार चपेट में आ सकता है। ऐसे में उन्हें क्वारंटीन में जाना पड़ सकता है। पर, इस समाज सेवा के बदले उन्हें अपयश मिलता है। इस वजह से वे अस्पताल खोलने से बच रहे हैं। प्रशासन ने वादा किया है कि अस्पताल सील नहीं होंगे वहीं आईएमए की अध्यक्ष डॉ. रमा श्रीवास्तव कहती हैं कि जिलाधिकारी, सीएमओ व अन्य अधिकारियों से साथ दो दिन पहले वार्ता हुई थी। आश्वासन दिया गया है कि अनावश्यक रूप से अस्पतालों पर कार्रवाई नहीं की जाएगी, अस्पताल सील नहीं होंगे। सर्जरी से पहले सभी मरीजों की जांच कराई जाएगी। अन्य किसी भी मरीज में लक्षण दिखने पर जांच कराई जाएगी। जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आते ही सीएमओ को सूचना दी जाएगी। फिर कोविड के लिए तय अस्पताल में पॉजिटिव मरीज का इलाज कराया जाएगा। मानकों को पूरा कर अस्पतालों को खोला जा रहा लखनऊ नर्सिंग होम एसोसिएशन के सचिव डॉ. जे भामरी का कहना है कि राजधानी में हर दिन ओपीडी में करीब 10 हजार मरीज देखे जाते हैं। इसी तरह करीब 500 मरीज भर्ती किए जाते हैं। धीरे-धीरे सभी मानकों को पूरा कर ओपीडी में भी देखने की कवायद शुरू की गई है। लेकिन अभी यह संख्या नाम मात्र की है। -------------- ...और कोरोना में भी यही हाल एक भी निजी अस्पताल को नोटिफिकेशन नहीं, सिर्फ सरकारी संस्थानों में इलाज कोरोना की जंग में सिर्फ सरकारी संस्थान शामिल हैं। जबकि शहर में 900 से अधिक निजी अस्पताल हैं। करीब 600 डायग्नोस्टिक सेंटर हैं। इनमें 12 अस्पताल 100 बेड से अधिक क्षमता वाले हैं। 50 से 100 बेड वाले अस्पताल करीब 400 हैं। अन्य इससे कम बेड वाले अस्पताल हैं। लेकिन अभी तक कोरोना के इलाज के लिए कोई भी अस्पताल नोटिफाई नहीं है। यानी निजी अस्पतालों का इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर और डॉक्टरों को इस जंग से बाहर हैं। सिर्फ निजी मेडिकल कॉलेज इलाज और क्वारंटीन की व्यवस्था में शामिल हैं। दावे अपने-अपने किसी अस्पताल ने कोरोना के इलाज की नहीं दी रजामंदी सीएमओ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि गाइडलाइन के तहत जहां कोरोना का इलाज होता है वहां दूसरे मरीज नहीं रखे जा सकते। 50 बेड से अधिक वाले अस्पतालों को कोरोना के इलाज के लिए पंजीयन कराने के लिए कहा गया है। इसके लिए मरीज के एंट्री करने का रास्ता अन्य मरीजों से अलग होना चाहिए। स्टाफ क्वारंटीन होने की स्थिति में दूसरे स्टाफ होने चाहिए। इसका ब्यौरा मांगा गया है। अभी तक कोरोना के इलाज के लिए किसी अस्पताल ने अपनी रजामंदी नहीं दी। यदि इमरजेंसी में जरूरत पड़ी तो गाइडलाइन के अनुसार पहले चरण में 100 बेड वाले अस्पतालों को अधिगृहीत किया जाएगा। निजी अस्पताल कह रहे हम तैयार निजी अस्पताल संचालकों का कहना है कि वे तो कोरोना की जंग में उतरने को तैयार है। बशर्ते प्रशासन उन्हें सहयोग करे। फैक्ट फाइल निजी अस्पतालों में कुल बेड करीब 25000 निजी अस्पतालों में वेंटिलेटर की व्यवस्था करीब 1500 केजीएमयू में करीब 4500 बेड, 270 वेंटिलेटर पीजीआई करीब 1000 बेड,100 वेंटिलेटर लोहिया संस्थान में 910 बेड, 25 वेंटिलेटर सरकारी अस्पताल में अब तक क्वारंटीन व आइसोलेशन बेड अस्पताल क्वारंटीन आइसोलेशन केजीएमयू 440 200 पीजीआई 0 210 आरएमएल 300 20 कैंसर संस्थान 50 0 सिविल अस्पताल 180 45 बलरामपुर 250 50 लोकबंधु 0 200