दारुल उलूम देवबंद ने चुनाव तक अपने परिसर में किसी सियासी शख्सियत के आने पर रोक लगा दी है तो लखनऊ के मशहूर नदवा कॉलेज ने परिसर में किसी तरह की राजनीतिक चर्चा पर ही पाबंदी लगा दी है।
पर दोनों ही इदारों के रोशनदान बंद नहीं हुए, सो हवा आती-जाती रहती है। आलिम भले ही खामोश रहें पर कॉलेज के आम छात्र किसी अन्य परिसर के छात्रों की तरह सियासी चर्चाओं में मशगूल हैं।
मोदी को लेकर दोनों ही जगह एक सा नजरिया है। अन्य नेताओं में मुलायम और राहुल का भी जिक्र होता है पर छात्रों के बीच केजरीवाल की चर्चा भी कम नहीं है।
दोनों ही इदारों के प्रशासनिक ओहदेदारों का कहना है कि हम अपनी संस्थाओं को किसी तरह के सियासी विवाद से बचाना चाहते हैं। पढ़ाई और दीनी मामलों तक ही अपने को सीमित रखना चाहते हैं।
धोखा होता है इनके साथ
ओहदेदारों ने कहा कि चुनावी मौसम आने पर हर दल के नेता उनके यहां शिष्टाचार मुलाकात के नाम पर आते हैं और फोटो खिंचवाकर वापस चले जाते हैं।
बाहर प्रचारित करते थे कि उन्हें देवबंद या नदवा का समर्थन हासिल हो गया। हम कहां तक इन बातों का खंडन करते। इसलिए राजनीतिक दुरुपयोग से बचने के लिए ऐसा कदम उठाया गया है।
तसवीर नदवा की-आलिम खामोश, स्टूडेंट्स चर्चा में मशगूल परिसर में चहल-पहल रोज की तरह है।
दोपहर का वक्त।
नमाज के तुरंत बाद कॉलेज के सेक्रेटरी (नाजिरे आम) हमजा हसनी से मुखातिब होता हूं। पर चुनाव का जिक्र आते ही तौबा कर लेते हैं। बताते हैं, करीब 15 दिन पहले कॉलेज प्रशासन ने चपरासी ले लेकर प्रोफेसर तक पर किसी तरह की सियासी गुफ्तगू पर पाबंदी लगा दी है। लिहाजा चुनाव तक कोई बात नहीं।
केजरीवाल में है ज्यादा दिलचस्पी
यह कहते हुए वो हाथ भी जोड़ लेते हैं और कुर्सी से उठने की कोशिश भी करने लगते हैं। पर परिसर में स्थित उनके घर के बाहर कई छात्र सियासी गुफ्तगू में उलझे दिखाई पड़ते हैं।
करीब जाता हूं तो खामोशी ओढ़ लेते हैं। यह जानकार कि पत्रकार हूं, कुद मुंह फेरकर चले जाते हैं तो कुछ रुक जाते हैं। आलिम की डिग्री लेने वाला भदोही निवासी हम्माम कहता है कि रोज चाय के साथ, अखबार पढ़ते समय सियासी बातचीत भी होती है।
मोदी को लेकर सबका नजरिया कमोबेश एक-सा होता है। पर मुलायम, कांग्रेस और केजरीवाल का भी जिक्र आता है। ज्यादातर छात्र केजरीवाल में दिलचस्पी लेते नजर आते हैं। उनकी साफ-सुथरी छवि व भ्रष्टाचार से लड़ने का जज्बा नौजवानों को झिंझोड़ता है।
पर बगल में खड़े कर्नाटक के मो. आतिफ कहते हैं कि वहां हम जिस तंजीम से जुड़े हैं वह कांग्रेस की हिमायत करती है, लिहाजा हमारा झुकाव भी उसी तरफ है। पर यहां यूपी के छात्रों में मुलायम के साथ केजरीवाल की चर्चा ज्यादा होती है।
राजनीति करते हैं पर बातें नहीं
दिलचस्प तो यह है कि कॉलेज में इन्फॉरमेशन फैकल्टी के डीन मौलाना सलमान नदवी परिसर में सियासत पर बातचीत करने में परहेज बरतते हैं। पर बाहर चुनावी सियासत पर बेहद सक्रिय हैं।
तफ्सील से बात करते हैं। देश के विभिन्न मुस्लिम संगठनों के पॉलिटिकल एडवायजरी बोर्ड का चेयरमैन होने के नाते मुसलमानों को इस बात का मशविरा देते हैं कि वे राज्यवार किस दल को वोट दें।
कहते हैं, नदवा में कॉलेज प्रशासन के नियमों के तहत काम करता हूं पर बाहर मेरी शख्सियत और भी है। देवबंद का हाल-बेजा राजनीतिक इस्तेमाल की चिंता दारुल उलूम देवबंद में नेताओं के आने-जाने और सियासी चर्चाओं पर पाबंदी संभवत: पहली बार लगी है।
संस्था के नायब मोहतमिम (डिप्टी वाइस चांसलर) मौलाना अब्दुल खालिक कहते हैं कि चुनाव के समय नेता सियासी लाभ के लिए यहां आते हैं और बाद में प्रचारित करते हैं कि देवबंद का उनको समर्थन है।
नेता आए पर सियासी चर्चा न करे
दरअसल कोई भी सियासी दल या नेता दारुल उलूम का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों के लिए न करे, इसलिए इस तरह की पाबंदी लगाई गई है।
खालिक कहते हैं कि इसके बावजूद हम नेताओं का आना रोक नहीं सकते। इसलिए यह फैसला किया गया है कि अगर कोई नेता यहां आ भी जाता है तो उससे कोई सियासी चर्चा नहीं करेगा और न ही उसका इस्तकबाल किया जाएगा।
जो संस्थाएं हमको डोनेशन देती हैं, वे भी पसंद नहीं करतीं कि हम किसी तरह के सियासी विवाद में पड़ें। वैसे मुसलमान की ख्वाहिश भी नहीं कि हम उनको चुनाव और वोटिंग के मामले में सलाह दें।
इसके लिए सियासी लोग ही काफी हैं। पर यहीं दौरे हदीस के फाइनल ईयर के छात्र अब्दुल बारी कहते हैं कि हम लोग दुनिया की हलचलों से बेवास्ता तो रह नहीं सकते। हॉस्टल के कमरों से लेकर चाय पीते समय व शाम को टहलते समय आपस में चुनावी चर्चाएं जोर पकड़ती हैं।
टीचर से बचकर चर्चा करते हैं बच्चे
दूसरी तरफ सपा, बसपा और कांग्रेस के साथ आम आदमी पार्टी की बातों में भी स्टूडेंट्स कम दिलचस्पी नहीं लेते। एक अन्य छात्र बताता है कि बातें तो होती हैं पर अपने टीचरों व मौलाना लोगों की नजरें बचाकर।
दारुल उलूम से सटे मदरसा जामिया तुश्शैख में अरबी के टीचर ताबिश कासमी कहते हैं कि कैम्पस में तो हम लोग सियासी चर्चाओं से परहेज बरतते हैं, पर बाहर आकर ऐसा नहीं हो पाता।
मोदी के कारण मुसलमानों में चुनाव को लेकर इस बार कुछ ज्यादा ही फिक्र है। पर आश्चर्यजनक तौर पर अरविंद केजरीवाल का नाम मदरसों के टीचरों से लेकर छात्रों के बीच कुछ ज्यादा ही इज्जत से लिया जा रहा है।
मोदी के कारण मुस्लिम चिंतित
दीनी-तालीमी मामलों की दो बड़ी संस्थाओं देवबंद व नदवा ने सियासी मामलों में अपने-अपने कारणों से खामोशी भले ही ओढ़ ली हो पर मुस्लिम मामलों से जुड़ी अन्य तमाम संस्थाएं मोदी के कारण इस चुनाव को कुछ ज्यादा ही अहम मान रही हैं। खुलकर तो ज्यादा कुछ नहीं बोल रही हैं पर अपने मुरीदों को वोटिंग को लेकर हिदायतें भी दे रहे हैं।
नरेंद्र मोदी जबसे राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभरे, मुसलमानों की चिंताएं हर बार की तुलना में ज्यादा बढ़ी हैं। ज्यादातर लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि एक पार्टी ऐसी है जो मुसलमानों को नजरअंदाज कर चुनावी मैदान में उतरी है।
न मुस्लिम हितों की बात करती है न एक भी मुसलमान को टिकट दिया। जामिया नूरिया रजबिया के संस्थापक मौलाना मो. मन्नान रजा खां मन्नानी का कहना है कि ऐसी चिंताओं और उथलपुथल के बीच मुसलमानों से बस यही कहना चाहूंगा कि ऐसे शख्स को वोट दें जो इंसाफपरस्त और सेक्युलर मिजाज हो।
संदेश पहुंचाने का तरीका-अपनी बात मुरीदों व समर्थकों तक पहुंचाने के लिए पहले तो हम मीडिया का सहारा लेते हैं।
डराया जा रहा है हमें
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के उपाध्यक्ष मौलाना कल्बे सादिक का कहना है कि इस चुनाव में मुसलमानों को कुछ बेजा तौर पर डराया जा रहा है। पर डरने की कोई वजह नहीं हैं।
वैसे भी मुसलमानों में तालीम कम है, इसलिए उनको जिस तरफ भी मुल्ला-मौलाना हांक देते हैं, वो वोट कर आते हैं।
इससे मुसलमानों का भला नहीं होता। मेरी मुसलमानों को मशविरा बस इतना है कि वे उस उम्मीदवार को वोट दें जो देशभक्त हो, सांप्रदायिक और भ्रष्टाचारी न हो। इस बात का खयाल न करें कि वह हिंदू है कि मुसलमान। पार्टी को लेकर भी कोई पूर्वाग्रह न पालें।
फिरकापरस्त को वोट न दें
मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली का कहना है कि प्रत्याशी के बजाय पार्टी पर ज्यादा गौर करें। पर मुसलमानों से अपील है कि वे उस पार्टी को प्राथमिकता दें, जिसने पिछले सालों में मुसलमानों के लिए तालीम और रोजगार की दिशा में कुछ कारगर कदम उठाए हों।
इस दिशा में पार्टी के भविष्य के इरादों को भी परखिए। हां, प्रत्याशी ऐसा होना चाहिए, जिसका दामन दागदार न हो और न ही फिरकापरस्त मिजाज का हो।
अगर कोई सिटिंग एमपी प्रत्याशी है तो यह भी देखिए कि उसके पिछले पांच साल कैसे रहे।