राजधानी में ड्रग विभाग मेडिकल स्टोरों पर तो छापा मार रहा है, लेकिन निजी अस्पतालों के मेडिकल स्टोरों पर कार्रवाई से कतरा रहा है। कमीशन के दम पर चल रहे ये मेडिकल स्टोर चल रहे हैं। अहम बात यह है कि प्राइवेट अस्पतालों में कितने मेडिकल स्टोर का लाइसेंस लिया गया, इसका तक रिकॉर्ड नहीं है। ड्रग-स्वास्थ्य विभाग एक-दूसरे के पास इसका आंकड़ा होने की बात कहकर पल्ला झाड़ रहे हैं। उधर, ये मेडिकल स्टोर राजस्व को हर महीने लाखों की चपत लगा रहे हैं।
ड्रग विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार जिले में करीब 4200 निजी मेडिकल स्टोर चल रहे हैं। वहीं, सीएमओ के अधीन 1200 से अधिक निजी अस्पताल पंजीकृत हैं। हालांकि, प्राइवेट अस्पतालों में चल रहे मेडिकल स्टोर का रिकॉर्ड किसी के पास नहीं है। रजिस्ट्रेशन के समय अस्पताल संचालक डॉक्टर, पैरा मेडिकल स्टाफ समेत अन्य संसाधन के दस्तावेज तो लगाते हैं, लेकिन फार्मेसी का रिकॉर्ड नहीं दिया जाता। वहीं, एफ एसडीए का दावा है कि बड़े व मध्यम श्रेणी के अस्पतालों ने फार्मेसी का लाइसेंस ले रखा है। छोटे अस्पतालों की फार्मेसी का रिकॉर्ड नहीं है। करीब 800 नर्सिंग होम ने अभी तक फार्मेसी का लाइसेंस नहीं लिया है। बावजूद इसके जिम्मेदारों की शह पर यहां सालों से अवैध तरीके से फार्मेसी चल रही है।
चार साल से पहले पड़ा था छापा
चार साल पहले डीएम के निर्देश पर उन्नाव, सीतापुर समेत अन्य जनपदों से ड्रग इंस्पेक्टर बुलाकर निजी अस्पतालों की फार्मेसी पर छापा मारा गया था। अकेले दुबग्गा इलाके में दस निजी अस्पतालों पर कार्रवाई में अवैध तरीके से फार्मेसी चलती मिली थी। उस दौरान टीम ने करीब 15 लाख रुपये की दवाएं जब्त की थीं।