मंत्रिमंडल गठन के फॉर्मूले में मोदी 2014 की राह पर ही चलते दिख रहे हैं। मेनका गांधी के अलावा अनुप्रिया पटेल, डॉ. महेश शर्मा और डॉ. सत्यपाल सिंह जैसे कई चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली है लेकिन 2014 पर नजर डालें तो आगे मंत्रिमंडल विस्तार के समय इन्हें मंत्री बनाया जा सकता है।
कारण पिछली बार भी मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते वक्त अपने अलावा यूपी से आठ मंत्री ही बनाए थे। जिनमें ये चेहरे शामिल नहीं थे। पिछली बार मोदी के साथ शपथ लेने वाले कलराज मिश्र और उमा भारती चुनाव ही नहीं लडे़। पिछली बार प्रधानमंत्री के साथ प्रदेश के चार चेहरों ने कैबिनेट मंत्री की शपथ ली थी। इस बार यह संख्या तीन है।
मोदी ने अपनी कैबिनेट में उत्तर प्रदेश के जिन चेहरों को शामिल किया है उससे साफ है कि नामों का चयन करते वक्त उनकी नजर न सिर्फ वरिष्ठता और अनुभव को सम्मान देने पर रही है बल्कि परिश्रम को महत्व देने का संदेश देने पर भी टिकी रही है।
इसीलिए एक तरफ राजनाथ सिंह को दूसरे नंबर पर शपथ दिलाई गई तो राहुल गांधी को हराने वाली स्मृति ईरानी को भी कैबिनेट मंत्री बनाकर अमेठी के सहारे न सिर्फ रायबरेली बल्कि उत्तर प्रदेश को भी खास संदेश दिया है।
संदेश यह है कि राहुल की हार के बावजूद भाजपा अमेठी की अनदेखी नहीं करने वाली। डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय को भी कैबिनेट मंत्री बनाकर उन्हें उ.प्र. भाजपा के अध्यक्ष के रूप में संगठन को विस्तार देने और प्रदेश में सत्ता व संगठन के बीच बेहतर समन्वय से भाजपा के अनुकूल समीकरण बनाने का ईनाम दिया गया है।
उत्तर प्रदेश से मंत्री बनाने वरिष्ठता, परिश्रम के साथ सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन पर भी नजर रखी गई है। साथ ही यह भी संकेत निकल रहा है कि मंत्रियों के चयन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राय को भी महत्व दिया गया है। इसीलिए संतोष गंगवार, वीके सिंह और संजीव बालियान के रूप में न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश को भागीदारी दी गई है बल्कि अगड़े और पिछड़े समीकरणों को संतुलित रखने की कोशिश करते हुए खासतौर से जाट व कुर्मियों को महत्व का संदेश देने की कोशिश की गई है। गंगवार आठ बार के सांसद हैं जबकि बालियान दूसरी बार के।
बालियान को चौधरी अजित सिंह को हराने का इनाम मिला है तो गंगवार के जरिये वरिष्ठता को सम्मान देने की कोशिश है। पूर्वांचल से खुद होने और पांडेय को लेकर मोदी ने इस क्षेत्र में भी अगडे़ व पिछड़ों का संतुलन साधने के साथ प्रदेश की लगभग 12 प्रतिशत से अधिक ब्राह्मण आबादी को भी महत्व देने का संदेश दिया है।
राजनाथ, ईरानी और साध्वी निरंजन ज्योति के जरिये मध्य उत्तर प्रदेश में भी अगड़ा व पिछड़ा संतुलन साधने की कोशिश की गई है। सिंह के रूप में अगड़ों में ब्राह्मण के साथ ठाकुरों को भी महत्व का संदेश दिया गया है और साध्वी के रूप में निषाद जाति को महत्व देकर अति पिछड़े एजेंडे को महत्व मिला है।
मोदी ने मंत्रिमंडल में सामाजिक समीकरणों का संतुलन बनाए रखने की कोशिश तो की है लेकिन प्रदेश से भाजपा के अनुसूचित जाति के 15 सांसद होने के बाद भी अनुसूचित जाति के किसी भी सांसद को कैबिनेट में जगह नहीं मिल पाई है। प्रदेश से ही राज्यसभा सदस्य हरदीप पुरी को कैबिनेट में शामिल करके सिख समुदाय को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है।