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तंगी का रोना रोने वाले नगर निगम लखनऊ के 180 बैंक खाते

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प्रवेंद्र गुप्ता, लखनऊ। नगर निगम के अलग-अलग बैंकों में 180 खाते हैं। इनमें तमाम ऐसे भी हैं, जिनका अब कोई मतलब नहीं है। नए नगर आयुक्त ऐसे गैरजरूरी खातों को बंद करना चाहते हैं, ताकि बजट पर पूरी नजर रहे। इसे लेकर आदेश भी जारी किया गया है। पूर्व में भी कई नगर आयुक्त खाते बंद कराने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन जितने कम हुए उससे अधिक वह खुद ही बढ़ा गए। इस समय करीब 15 बैंकों की 50 से अधिक शाखाओं में 180 खाते हैं।
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वित्तीय प्रबंधन के जानकार बताते हैं कि आठ जोनों में बंटे नगर निगम का कामकाज अधिकतम 35 से 40 बैंक खातों से चल सकता है। वैसे भी म्यूनिसिपल बॉन्ड आने के बाद नगर निगम का सारा पैसा एक एस्क्रो खाते में रहना चाहिए। सूत्रों का कहना है कि 200 करोड़ रुपये के म्यूनिसिपल बॉन्ड जारी होने के समय एक एस्क्रो अकाउंट खोला गया था। यह इसलिए खोला गया था कि नगर निगम की आय का जो पैसा आए उसमें से पहले बॉन्ड से मिले धन के लिए हर महीने करीब 3.70 करोड़ रुपये ब्याज की राशि को अलग कर जो पैसा बचे उसको नगर निगम खर्च करे।
नुकसान कोई नहीं, मगर कुछ लोगों का फायदा
जानकार बताते हैं कि अधिक बैंक खाता होने से नगर निगम का कोई नुकसान नहीं है। हालांकि, अधिक खाते होने से नगर निगम लेखा विभाग से लेकर ठेकेदारों तक का फायदा जरूर होता है। किस खाते में कितना पैसा पड़ा है, यह मुखिया को आसानी से पता नहीं चल पाता है। ऐसे में नीचे के अफसर लेखा विभाग की मिलीभगत से अपने चहेते ठेकेदारों को उन खातों से भुगतान कर देते हैं। करीब तीन साल पहले भी नगर निगम ने बैंक खातों को कम किया था। उस समय करीब 280 खाते थे और उनको कम करके 100 किया गया था। उसके बाद पिछले दो साल में फिर बैंक खातों की संख्या 180 पहुंच गई।
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आसानी से बंद नहीं हो रहे खाते
पिछले एक सप्ताह में नगर निगम दो निजी बैंकों में अपने 42 खाते बंद करा चुका है। इतने ही और खातों को बंद कराने के लिए पत्र भेजा गया है। हालांकि, बैंक इसमें टालमटोल कर रहे हैं, क्योंकि इससे प्रबंधन के सामने उनकी रिपोर्ट खराब होगी। कई बैंक एस्क्रो अकाउंट में रोज पैसा नहीं भेजते। एक निजी बैंक तो ऐसा है जो एक से दो महीने पर पैसा भेजता है, जो म्यूनिसिपल बॉन्ड के तहत हुए अनुबंध का उल्लंघन है।
वित्तीय प्रबंधन में समस्या
नगर आयुक्त इंद्रजीत सिंह ने बताया कि लेखा विभाग को बैंक खातों की संख्या कम करने को कहा गया है। जो खाते गैर जरूरी हैं उनको बंद किया जाएगा। अधिक खाते होने से वित्तीय प्रबंधन में भी समस्या आती है। कम खाते होंगे तो सबका हिसाब-किताब आसानी से समझा जा सकेगा। बैलेंस शीट बनाने में भी सहूलियत रहती है।
आमदनी कम और खर्चे ज्यादा
नियमित कर्मचारियों के वेतन-पेंशन को छोड़कर नगर निगम को सफाई, मार्ग प्र्रकाश, पार्षद कोटा आदि पर सालाना करीब 600 करोड़ से अधिक खर्च करना पड़ता है, जबकि उसकी आमदनी करीब 400 करोड़ ही है। ऐसे में यदि राज्य वित्त का पैसा न आए तो नगर निगम कर्मचारियों को वेतन भी नहीं दे पाएगा। नियमित और संविदा कर्मचारियों को मिलाकर नगर निगम को सलाना करीब 450 करोड़ रुपये वेतन-पेंशन व कर्मचारियों के अन्य देयकों पर खर्च करना पड़ता है। सालाना करीब 300 से 350 करोड़ रुपये शासन राज्य वित्त मद से देता है और शेष नगर निगम को अपनी आय से मिलाना पड़ता है। नगर निगम न तो कर्मचारियों का कई सालों से बकाया करीब 70 करोड़ रुपये दे पा रहा है और न ही ठेकेदारों का करीब 300 करोड़ चुका पा रहा है।
योजनाएं बंद, पर खाते चालू
- जेएनएनयूआरएम योजना बंद हुए आठ साल हो गए, लेकिन योजना को लेकर जो सात बैंक खाते खोले गए थे, वह अब भी चल रहे हैं।
- तीन साल पहले राजधानी में डिफेंस एक्सपो हुआ था। उस समय इस आयोजन के लिए आए बजट के लिए अलग खाता खोला गया था। एक्सपो समाप्त हो चुका है, लेकिन बैंक खाता चल रहा है।
- प्रदेश सरकार की समग्र विकास योजना अब बंद है। सात साल से योजना में एक भी पैसा नहीं आया। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद से योजना भी बदल चुकी है, लेकिन समग्र विकास योजना का खाता अब भी चल रहा है।
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