मुजफ्फरनगर दंगों के एक महीने बाद भी हालात सुधरे नहीं हैं, बल्कि कैंपों में रह रहे लोगों को स्वास्थ्य से लेकर सुरक्षा तक की चिंताओं ने घेर रखा है।
लोग अपने परिजनों को तलाश रहे हैं, जो भगदड़ और बलवाइयों के हमलों के दौरान बिछड़ गए थे।
आशंका जताई जा रही है कि ये सभी मारे गए हैं और ऐसे में दंगों में मरने वालों की संख्या फिलहाल बताई गई संख्या से कहीं ज्यादा हो सकती है।
इन्हीं बातों को रखते हुए शुक्रवार को राजधानी में विभिन्न संगठनों ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट ‘30 डेज एंड काउंटिंग’ जारी की।
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संगठनों में मुजफ्फरनगर से अस्तित्व, लखनऊ से हमसफर, नेशनल अलायंस ऑफ पीपल्स मूवमेंट, निरंतर, रहनुमा सनतकदा सामाजिक पहल, सहयोग, नई दिल्ली से समा, चित्रकूट से वनांगना और मुंबई से फॉरम अगेंस्ट ऑप्रेशन ऑफ वुमन ने साझा मोर्चा ‘जॉइंट सिटीजंस इनिशिएटिव’ नाम से बनाकर यह रिपोर्ट जारी की।
इस दौरान समा की दीपा ने बताया कि कैंपों में बीमारियां और गंदगी लगातार बढ़ रही है जो हजारों लोगों का जीवन संकट में डाल सकती है।
वहीं सामाजिक कार्यकर्ता और एडवोकेट असकरी नकवी ने बताया कि लोगों को कानूनी मदद चाहि, क्योंकि पुलिस में बहुत से मामले दर्ज ही नहीं हुए हैं।
इनसे 284 एफआईआर पिछले एक महीने में दर्ज हुई हैं, जबकि लोग डरे हुए हैं, विशेष तौर से महिलाएं, और वे पुलिस के पास नहीं जा रहे।
पुलिस की मौजूदगी में कुछ विस्थापितों के समूहों को वापस उनके गांव में लौटाने की कोशिश की गई लेकिन डर की वजह से उन्हें वापस कैंप में लौटना पड़ा।