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स्मृति शेष : हुई मां से लिपटने की ख्वाहिश पूरी, फरिश्ता बन जन्नत को चला मुनव्वर...

Mon, 15 Jan 2024 02:33 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव माई सिटी रिपोर्टर, लखनऊ

सार

हसन काजमी कहते हैं कि उस वक्त तो वे एक ट्रांसपोर्ट का बिजनेस करने वाले थे। रायबरेली के थे, पर रहते कलकत्ता में थे। वहीं पढ़े-लिखे और ट्रांसपोर्ट का बिजनेस शुरू किया। फिर रुख किया लखनऊ का, जहां उन्हें शागीर्दी मिली उस्ताद वाली आसी की।
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मुनव्वर राना file - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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दुख भी ला सकती है लेकिन जनवरी अच्छी लगी,

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जिस तरह बच्चों को जलती फुलझड़ी अच्छी लगी
रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा
मुझको अपनी मां की, मैली ओढ़नी अच्छी लगी।

ये वो पंक्तियां हैं, जिनके वायरल होते ही मुनव्वर देश-दुनिया में छा गए और लोगों को मिला एक एसा शायर, जिसकी हर लाइन मां से शुरू होती और मां पर ही खत्म होती थी। ये भी अजब इत्तेफाक है कि ये जनवरी आई, दुनिया से एक अजीम शख्सियत के चले जाने का दुख दे दिया, पर मुनव्वर की उस ख्वाहिश को पूरा कर दिया, जो उन्होंने अपनी मां की मौत पर कहीं थीं कि

मेरी ख्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं
मां से इस तरह से लिपट जाऊं की बच्चा हो जाऊं।

मुनव्वर राना का निधन रविवार रात 11.30 बजे के करीब पीजीआई में हुआ। जैसे ही ये खबर अस्पताल से बाहर आई, रात सोने के लिए बिस्तरों पर पहुंच चुके उनके चाहने वालों की नींदें उड़ गईं। इन्हीं में से एक हैं उनके हम प्याला-हम निवाला रहे वरिष्ठ पत्रकार और वरिष्ठ शायर हसन काजमी। फोन उठाते ही कहा, बहुत अच्छा किया। ढेरों यादें हैं, सुना कर कम से कम कुछ तो दिल का बोझ हलका होगा।

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ट्रांसपोर्टर के बिजनेस से शायर बनने तक

लालकुआं के पास मुनव्वर राणा के घर के बाहर जमा लोग - फोटो : अमर उजाला
हसन काजमी कहते हैं कि उस वक्त तो वे एक ट्रांसपोर्ट का बिजनेस करने वाले थे। रायबरेली के थे, पर रहते कलकत्ता में थे। वहीं पढ़े-लिखे और ट्रांसपोर्ट का बिजनेस शुरू किया। फिर रुख किया लखनऊ का, जहां उन्हें शागीर्दी मिली उस्ताद वाली आसी की। यहीं उनसे मिला मैं और कब दोस्त बन गए पता नहीं चला। गुलमर्ग होटल अमीनाबाद में इन्होंने एक कमरा लिया और शुरू हो गया महफिलों का दौर। इस बीच अखबार निकालने की एक नाकाम कोशिश शुरू हुई। 
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